इक खुला आसमान देना है
हर किसी को उड़ान देना है
एक के बाद दूसरा पर्चा
उम्र भर इम्तिहान देना है
दिल में इतनी जगह तो दो जानाँ
तुम को अपना जहान देना है
चाहे तुम हो या बे-ज़बां कोई
हर किसी को अमान देना है
मुहब्बत मुझसे है तो एक वादा कर
मुझे चाहो न चाहो ख़ुद को चाहा कर
तेरी ख़ूबी में अक्सर भूल जाता हूँ
कभी हीरा कभी पत्थर पुकारा कर
दुआयें भी नहीं और राह पथरीली
सफ़र कर पर हवा का रुख भी देखा कर
अगर भरना है तो भर लो उड़ान ऊँची
मगर कंधों से पहले बोझ हल्का कर
भोर होने को है हर रात को यूँ समझा है
मुश्किलों से भरे हालात को यूँ समझा है
शांत इस तरह ही होती है पहाड़ी नद्दी
हर उबलते हुये जज़्बात को यूँ समझा है
मेरा किरदार कहानी में अभी है ज़िंदा
बाद मुद्दत की मुलाक़ात को यूँ समझा है
इम्तिहानों के लिये ज्ञान मिला है आतिश
ज़िन्दगी में मिली हर मात को यूँ समझा है
शाम को रोज़ बुलंदी से उतर आते हैं
जो परिंदे हैं वो तो लौट के घर आते हैं
उम्र भर साथ निभाने को कोई कहता है
तब मुहब्बत में अगर और मगर आते हैं
उनको व्यापार ही व्यापार नज़र आता है
लोग जो जिस्म की गलियों से गुज़र आते हैं
बे-वफ़ाओं की बताता हूँ अनूठी पहचान
वे ज़ियादा ही वफ़ादार नज़र आते हैं
राह जब भी तवील हो जाए
हर क़दम एक मील हो जाए
लटके रहना सलीब पर तय है
ज़िन्दगी जब वकील हो जाए
ख़ुशनुमा ख़्वाब आयेगा तय हो
दिन कभी जब तवील हो जाए
एक मुद्दत से आस है ‘आतिश’
इश्क़ उसको भी फ़ील हो जाए
हौसला गर जवाँ रहे ‘आतिश’
उम्र फिर तो तवील हो जाए
यार तुम बद-नसीब कैसे हो
बाप है फिर ग़रीब कैसे हो
आप अटके शिया और सुन्नी में
फिर ख़ुदा के क़रीब कैसे हो
ख़ुद की थाली में छेद कर डाला
यार इतने अजीब कैसे हो
बूढ़े बरगद की छाँव में हो तुम
बेटे फिर ग़म-नसीब कैसे हो
तुमसे पूरी हुई कहानी यह
दोस्त हो तुम रक़ीब कैसे हो