जब तक मैं ज़िंदा हूँ बस तब तक ही बुराई सह लो मेरी
मरने के बाद तो वैसे भी अच्छा कहलाने वाला हूँ
चार दिन झूठी बाहों के आराम से
मेरी बिखरी हुई ज़िंदगी ठीक है
दोस्ती चाहे जितनी बुरी हो मगर
प्यार के नाम पर दुश्मनी ठीक है
मैं सरकार की नाकामी पर उँगली नहीं उठाऊँगा
आख़िर इक सरकारी नौकर के कारण मैं शायर हूँ
कभी पहले नहीं था जिस क़दर मजबूर हूंँ मैं आज
नज़र आऊँ न ख़ुद क्या तुमसे इतना दूर हूँ मैं आज
तुम्हारे ज़ख़्म को ख़ाली नहीं जाने दिया मैंने
तुम्हारी याद में ही चीख़ के मशहूर हूंँ मैं आज
सवेरे से ले बैठा हूँ गुलाल अपने मैं हाथों में
न ये बेरंग हो जाए तुम अपना गाल इधर कर दो
जब रोजी रोटी कपड़ा और मकान गया
क्या इश्क़ की फ़ितरत होती है मैं जान गया
मैं सत्य अहिंसा के रस्ते पर निकला था
पहले तो आँखें फिर ज़बान फिर कान गया
बाक़ी क़ब्रों की मुझसे शिक़ायत जाएज़ थी
मरने के बाद भी देर से क्यूॅं शमशान गया
उस झुमके वाली का जब मैंने नाम सुना
ख़ुद ग्राहक कैसे बिकते हैं ये जान गया
बस बीस रुपए थी क़ीमत उसके झुमके की
बिकते हैं आशिक़ सस्ते में मैं मान गया
ज़िस्त की जान जाते भी देखा हूंँ मैं
मौत को साँस आते भी देखा हूंँ मैं
सब तो हँसते ही हैं मेरे हालात पे
दर्द को मुस्कुराते भी देखा हूंँ मैं
तो क्या ये हो नहीं सकता कि तुझ से दूर हो जाऊंँ
मैं तुझ को भूलने के वासते मजबूर हो जाऊँ
सुना है टूटने पर दिल सभी कुछ कर गुजरते हैं
मुझे भी तोड़ दो इतना कि मैं मशहूर हो जाऊँ