वही इक इश्क़ दिल को बे-तहाशा याद आता है
    फिर उस ने जो किया हर इक तमाशा याद आता है

    दिखाती कब हैं अपना दर्द माएँ इस ज़माने को
    वगरना उन को बच्चा बे-तहाशा याद आता है
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    Omkar Bhaskar Das
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    मोहब्बत ने कभी हम को कहीं तन्हा नहीं छोड़ा
    सो इक तस्वीर ने मेरा अभी बटुआ नहीं छोड़ा

    बड़े नोटों के आने जाने का क्या ही भरोसा है
    सही तो है कि हम ने भी कभी सिक्का नहीं छोड़ा

    चले थे छोड़ कर घर बार हम तन्हा बिताने दिन
    मगर इक दिल की चाहत ने मिरा पीछा नहीं छोड़ा

    है सीखा हमनें जीना ज़िन्दगी, हालात से जुड़कर
    वगरना हम ने ऐसे तो कभी का'बा नहीं छोड़ा

    तुम्हीं शब भर रहे मुझ
    में भटकते ख़्वाब की सूरत
    बताये क्या कि क्यूँ हम ने तिरा सजदा नहीं छोड़ा

    किसे है बैर साहिल के नजारों से, मगर दिल ने
    कभी भी दश्त में तूफान से लड़ना नहीं छोड़ा

    वजू करने चले थे हम गुनाहों को जब दरिया में
    तो हम ने एक भी फिर मुल्क में दरिया नहीं छोड़ा
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    Omkar Bhaskar Das
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    हसीं इक चेहरे को देखा करेंगे
    मोहब्बत कुछ तो हम खर्चा करेंगे

    न सीखा हम ने मन की बात करना
    मिलो, हम चाय पे चर्चा करेंगे

    रखेंगे इश्क़ की लज़्ज़त को क़ायम
    सो हम महबूब से पर्दा करेंगे

    अना का ये तराज़ू तोड़ देंगे
    कि ऐसा मौत से सौदा करेंगे

    फ़क़त इक ज़िन्दगी में इतने वादे
    ज़रूरी तो नहीं पूरा करेंगे

    नहीं है चाँद की हम को ज़रूरत
    के इक जुगनू को हम दीया करेंगे

    वफ़ा का जिक्र होगा गर कहीं 'दास'
    तेरा ही नाम हम लिक्खा करेंगे
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    Omkar Bhaskar Das
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    वो इक क्या वाक़िआ' था याद होगा
    तुम्हें हम से गिला था याद होगा

    उदासी इस क़दर क्यूँ रिस रही है
    ख़ुशी का इक समा था याद होगा

    दिल रह पाएगा इन बंदिशों में
    तुम्हारा तज़्किरा था याद होगा

    मिलो तुम आज फिर उस खंडहर में
    वहाँ कुछ वास्ता था याद होगा

    परिंदों को क़फ़स में देख कर यूँ
    शजर तन्हा खड़ा था याद होगा

    तुम्हारे इश्क़ में जो रात भर यूँ
    वो लड़का जागता था याद होगा

    तुम्हीं को इल्म होगा उस ग़ज़ल का
    अरे! क्या क़ाफ़िया था, याद होगा

    कहाँ तुम खो गए आख़िर, जो दिल की
    गली का रास्ता था याद होगा
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    Omkar Bhaskar Das
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    बुजुर्गों की दी ये इकलौती दौलत छोड़ जाएँगे
    दो आँखों में बसे रहने की आदत छोड़ जाएँगे

    दो आँखें, वो अदा, इक मुस्कुराहट जिस गली में हैं
    उसी सकरी गली में हम मोहब्बत छोड़ जाएँगे

    ये सारा जिस्म ले कर हम चले जाएँगे जब कल शब
    तुम्हारे पास अपने दिल की तुर्बत छोड़ जाएँगे

    करेगा याद मुझ को ये ज़माना मेरे जाने पर
    सभी के दिल में हम ऐसी मोहब्बत छोड़ जाएँगे

    ग़रीबी का त'अल्लुक मेरे बच्चों से कभी ना हो
    हम अपनी ज़िंदगी में इतनी उजरत छोड़ जाएँगे

    हुआ ऐलान नौकरशाही के पेशे का हम को 'दास'
    चले जो हम गए तो ख़ुद की किस्मत छोड़ जाएँगे
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    Omkar Bhaskar Das
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    मैं दिल की ख़ूब-सूरत इक कहानी छोड़ आया हूँ
    कल उस की खिड़की पे मैं रातरानी छोड़ आया हूँ

    वो कहते हैं कि देखो, दास के लहजे में नरमी है
    मैं कहता हूँ कि मैं अपनी जवानी छोड़ आया हूँ

    निभा पाया नहीं फिर कोई रिश्ता दिल से, के जबसे
    मैं उस इक शख़्स से यारी पुरानी छोड़ आया हूँ
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    Omkar Bhaskar Das
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    रहेगी दोस्ती कब तक फ़क़त ये आशिक़ी कब तक
    भला खेलेगी हम से इस तरह ये ज़िन्दगी कब तक

    बिता दी हम ने शा
    में-हिज्र तन्हाई को जी कर के
    बता भी दो रहेगी दिल में ये नाराजगी कब तक

    कभी तो लौट कर आए मुझे महबूब का ख़त भी
    फ़क़त करते रहेंगें ख़त में हम ही शा'इरी कब तक

    शजर इक कट गया उन की नज़र के सामने ही फिर
    खलेगी इन परिंदों को भला ये ख़ामुशी कब तक

    फ़क़त रिश्ते निभाने का दिखावा करते हो क्यूँ तुम
    भला ये कैसी यारी, हम रहेंगें अजनबी कब तक
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    Omkar Bhaskar Das
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    क्या होगा फिक्र ये करें क्यूँ हम ही ख़ामख़ाह
    इस हिज्र में जलाएँ न अब हम जी ख़ामख़ाह

    तुम से बिछड़ के दिल मिरा रोया है उम्र भर
    ऐसा लगा कि ज़िंदगी हमनें जी ख़ामख़ाह
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    Omkar Bhaskar Das
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