नक़्श-ओ-निगार-ए-माज़ी रह रह के याद आए
दो चार ख़ूँ के क़तरे पलकों पे डगमगाए
दो चार ख़ूँ के क़तरे पलकों पे डगमगाए
तीरों ने ख़ुद-कुशी की, दम ख़ंजरो का निकला
बिस्मिल ने हँसते हँसते सीने पे ज़ख़्म खाए
इस बार भी उदासी हम से सँभल न पाई
इस बार भी बज़ाहिर हम ख़ूब मुस्कुराए
सुन अब के इक अनोखी तरकीब मुझ को सूझी
मैं तुझ को भूल जाऊँ, तू मुझ को भूल जाए
दिल खोल कर के मैं ने ख़ुद को हदफ़ बनाया
दिल खोल कर के उस ने सब तीर आज़माए
मैं अपनी आबरू की मिट्टी पलीद कर दूँ
लेकिन तेरी अना पर हरगिज़ न हर्फ़ आए
बस्ती में रहने वाले सब होश खो रहे हैं
काज़िम से जा के कहिए ग़ज़लें न गुनगुनाए
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कम अज़ कम इक ज़माना चाहता हूँ
कि तुम को भूल जाना चाहता हूँ
कि तुम को भूल जाना चाहता हूँ
ख़ुदारा मुझ को तन्हा छोड़ दीजे
मैं खुल कर मुस्कुराना चाहता हूँ
सरासर आप हूँ मद्दे मुक़ाबिल
ख़ुदी ख़ुद को हराना चाहता हूँ
मेरे हक़ में उरूस-ए-शब है मक़्तल
सो उस से लब मिलाना चाहता हूँ
ये आलम है, कि अपने ही लहू में
सरासर डूब जाना चाहता हूँ
सुना है तोड़ते हो दिल सभों का
सो तुम से दिल लगाना चाहता हूँ
उसी बज़्म-ए-तरब की आरज़ू है
वही मंज़र पुराना चाहता हूँ
नज़र से तीर फैंको हो, सो मैं भी
जिगर पर तीर खाना चाहता हूँ
चराग़ों को पयाम-ए-ख़ामुशी दे
तेरे नज़दीक आना चाहता हूँ
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दुरुस्त है, कि ये गुल ख़ूबरू बहुत है मगर
वो बात गुल में कहाँ, जो हमारे यार में है
मुक़ाबला जो हसीनों से कर लिया जाए
तो फिर वो जीत में कब है, जो लुत्फ़ हार में है
समा दिया है जो हक़ ने तुम्हारी बाँहों में
कब इतना लुत्फ़ मेरी जान लालाज़ार में है
मेरी नज़र में मुनाफ़े से कम नहीं काज़िम
वो हर ज़ियाँ, जो मोहब्बत के कारोबार में है
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प्याला ए अंगबीन क्यूँ हो तुम
इस क़दर दिल नशीन क्यूँ हो तुम
इस क़दर दिल नशीन क्यूँ हो तुम
तुम को देखूं, तो होश खो बैठूँ
यार इतने हसीन क्यूँ हो तुम
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