Aamir Ali

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    रहो तुम भी यूँ जैसे ग़म रहा है
    मोहब्बत का यही आलम रहा है

    यहाँ खिलता नहीं है फूल कोई
    यहाँ मौसम भी बे-मौसम रहा है

    तुम्हें क्या याद है वो पल हमारे
    यही शिकवा मुझे हर दम रहा है

    ये काग़ज़ पे बिखरते लफ़्ज़ देखो
    पिघलते अश्क में ख़ूँ जम रहा है

    कहीं कोई मेरे जैसा भी 'आमिर'
    ख़ुदा की क़ैद में आदम रहा है

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    ख़लिश जिगर में कशिश नज़र में यही है तेरा मेरा फ़साना
    क़दम बढ़ा तू अदम की जानिब जहाँ से आया वहीं है जाना

    तुम्हीं बता दो तुम्हीं जता दो नहीं चलेगा कोई बहाना
    जहाँ मिले हम सदा खिले हम अगर हो ऐसा कोई ठिकाना

    ख़िज़ाँ की रुत में ये ज़ेब-ओ-ज़ीनत गुलाब लहजा करे अदावत
    पिघलते शीशे मचलते पत्थर दिखाए अंदाज़ आशिक़ाना

    नसीब मेरा चमक उठा है क़दम क़दम पर मिला है रहबर
    नए सफ़र पे निकल पड़ा हूँ भुला के अब वो मकाँ पुराना

    निखारता है अदा-ए-वहशत तराशता है बला-ए-क़ुदरत
    बना समंदर ग़नी क़लंदर तेरा दिवाना लिखे तराना

    Aamir Ali
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    आज तोड़ो राब्ता इनात से
    बात करनी है ख़ुदा की ज़ात से

    नींद अब आती नहीं है रात भर
    ख़्वाब कुछ मजबूर हैं हालात से

    बात ग़ुर्बत के तमाशे की सुनो
    एक बस्ती जल गई ख़ैरात से

    अब ये सूनापन करे है शोर सा
    बात जो बनती नहीं है बात से

    घर पुराना है दरारों से भरा
    क्यूँ गिला-शिकवा करें बरसात से

    Aamir Ali
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    नज़र में अदा हो हया से भरी हो
    ख़मोशी भी तेरी सदा से भरी हो

    समंदर है लहरें बला से भरी हो
    कशिश में हवाएँ वबा से भरी हो

    न कोई मुरव्वत न कोई रिआयत
    ये क्या ज़िंदगी बद-दुआ से भरी हो

    ज़माना बदलता रहा है मगर तुम
    सुना है कि अब भी अना से भरी हो

    मुझे और कुछ भी नहीं चाहिए बस
    मेरी जेब तेरी वफ़ा से भरी हो

    Aamir Ali
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    सबब बे-सबब याद करता रहा मैं
    बयाबान आबाद करता रहा मैं

    सुना शेर ग़ालिब का फ़रहाद पर जब
    तो फ़रहाद फ़रहाद करता रहा मैं

    हवाएँ बनी ज़ुल्म की दास्ताँ-गो
    परिंदों की इमदाद करता रहा मैं

    सर-ए-आम दुश्मन करे अब तमाशा
    तो इरशाद इरशाद करता रहा मैं

    ज़माना बड़ा सख़्त गुज़रा है 'आमिर'
    ज़माने से फ़रियाद करता रहा मैं

    Aamir Ali
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    नया है सफ़र रहनुमाई नहीं है
    ख़ुदा से मेरी आशनाई नहीं है

    सफ़र में मिले हैं कई हमसफ़र पर
    किसी से मेरी हमनवाई नहीं है

    ज़माना उसे तो ख़ुदा मानता है
    मगर उस ख़ुदा में ख़ुदाई नहीं है

    जहाँ में वफ़ा का यही है तराना
    वफ़ा आपने भी निभाई नहीं है

    हदें आपकी सरहदें आपकी हैं
    यहाँ से किसी की रिहाई नहीं है

    Aamir Ali
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    ये किस भूक में अंजुमन जल गया
    है साज़िश सियासी वतन जल गया

    लगा था कि आसान होगा सफ़र
    कड़ी धूप में पैरहन जल गया

    न मोमिन हुआ तू न काफ़िर हुआ
    गया क़ब्र में तो कफ़न जल गया

    फ़रेबी बहारें सितमगर सबा
    जहाँ से चली वाँ चमन जल गया

    सुख़न-दान कोई मिला ही न जब
    हुआ ये कि लुत्फ़-ए-सुख़न जल गया

    Aamir Ali
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    तआरुफ़ है दर-पेश आमिर
    बता दो मैं शाइर नहीं हूँ

    Aamir Ali
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    किसे बे-ख़बर ढूँढता है
    इधर हूँ उधर ढूँढता है

    वो मुझ से मिला कुछ यूँ जैसे
    बयाबाँ बसर ढूँढता है

    नए शहर में हर मुसाफ़िर
    किराए का घर ढूँढता है

    नज़र से नज़र तो मिली पर
    निशाना जिगर ढूँढता है

    सफ़र पर जो निकले तो पाया
    सफ़र हमसफ़र ढूँढता है

    वो साक़ी तो हाज़िर है हर-दम
    ये मय-कश पहर ढूँढता है

    Aamir Ali
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    गिला है न शिकवा है कोई
    रक़ीबों में अपना है कोई

    वो आला या अदना है कोई
    वो दावा-ए-तक़्वा है कोई

    वो आवाज़ देता नहीं अब
    मुझे यूँ भी रखता है कोई

    ये दामन अगर तुम हटा दो
    तो जाने कि सपना है कोई

    नया साल आने को है अब
    तेरी राह तकता है कोई

    ये ज़ुल्म-ओ-सितम क्या है आमिर
    यूँ वहशत भी लिखता है कोई

    Aamir Ali
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