मंदी में, महँगा सामान सँभाले हम
बैठे हैं, दिल में अरमान सँभाले हम
आँखों मे सैलाब की, गर्दिश जारी है
और सीने में, हैं तूफ़ान सँभाले हम
होंठों पर मुस्कान सजाए, बैठे हैं
कितने होठों की मुस्कान सँभाले हम
उल्फ़त के बाज़ार, में बेची बीनाई
लौटे हैं, फिर भी नुक़सान सँभाले हम
क़स्र मुबारक़ हो तुमको ये ख़ुशियों का
अच्छे से हैं, दिल वीरान सँभाले हम
मजबूरी ही, बाज़ीगर की हिम्मत है
रस्सी पर चलते हैं, ध्यान सँभाले हम
मतलब की इस दुनिया में भी जीते हैं
जैसे-तैसे, अपनी जान सँभाले हम
ज़र्द हुए पत्तों की क़िस्मत क्या आख़िर
टूट गए शाख़ों का मान, सँभाले हम
उसके कूचे में हर शख़्स ख़ुदा था सो
लौट आए अपनी औसान सँभाले हम
मज़लूमों की चीख़ें सुनते हैं 'आज़ाद'
बहरों की बस्ती में, कान सँभाले हम
पंख कतर कर मुझको दिलबर फेंक दिया
अम्बर से धरती पे लाकर फेंक दिया
मै तो था आबाद नशेमन पर तुमने
ज़ीस्त को मेरी करके बंजर फेंक दिया
अपने आपको रौशन करके फिर उसने
तीली सा मुझको सुलगाकर फेंक दिया
झोली फैलाई, फूलों की ख़ाहिश में
मेरी सम्त उठाकर पत्थर फेंक दिया
पहले प्यार जताया मुझपर ख़ूब उसने
फिर ज़ालिम ने मुझपर, ख़ंजर फेंक दिया
आप की इज़्ज़त की ख़ातीर देखो हमने
अपने सर का ताज ज़मीं पर फेंक दिया
तुमने जब ऐलान-ए-जंग किया, हमने
अपने तन से खींच के बख्तर फेंक दिया
उल्फ़त की चोट आहो फ़ुग़ाँ सिसकियाँ तमाम
वो मेरे नाम कर गए बेचैनियाँ तमाम
ज़ेहन और जिगर में जब भी मचलते हैं ज़लज़ले
तंग आ के चीख़ पड़तीं हैं ख़ामोशियाँ तमाम
रक्खेंगे कब तलक मुझे यूँ ही क़तार में
सुन लीजिए हुज़ूर मेरी अर्ज़ियाँ तमाम
नफ़रत को अपने क़ल्ब से बाहर निकालिए
दरिया में फेंक आइए ये बर्छियाँ तमाम
फूलों में तेरा रंग, हवाओं में है महक
जलवों में तेरे जज़्ब हैं रानाइयाँ तमाम
शायद अभी भी आपको फ़ुर्सत नहीं मिली
रक्खी हैं ताक़चे पे मेरी चिट्ठियाँ तमाम
मैंने जो इक शजर की हिफ़ाज़त सँभाल ली
मेरे ही सम्त हो गईं फिर आँधियाँ तमाम
इक ख़्वाब देखता हूँ मैं आज़ाद रोज़ो-शब
महफूज़ है वतन की मेरे बेटियाँ तमाम
तन्हाई ही तन्हाई है, मौला ख़ैर करे
ख़ाना-ए-दिल पर जो छाई है, मौला ख़ैर करे
जानाँ तेरी यादों में अब अश्क बहाने की
फिर ये आँख तमन्नाई है, मौला ख़ैर करे
ज़ख़्म-ए-दिल है, मैं हूँ, और उदासी है हर-सू
अब जान मेरी घबराई है मौला ख़ैर करे
तेरी राहें तकते-तकते, मेरी आँखों की
बुझने पर अब बीनाई है, मौला ख़ैर करे
हाल न पूछा, उसने मेरी ज़र्द तबीअत का
यार भी मेरा हरजाई है, मौला ख़ैर करे
मेरे सर इल्ज़ाम लगे हैं, तर्क-ए-उल्फत के
मेरे हिस्से रुसवाई है, मौला ख़ैर करे
याँ तो वो ही मुंसिफ़ भी है और क़ातिल भी है
ज़ेर ए अदालत सुनवाई है, मौला ख़ैर करे
बीमार-ए-उल्फ़त हूँ मैं आज़ाद, मगर ख़ुश हूँ,
उसकी हिम्मत-अफ़ज़ाई है, मौला ख़ैर करे
तेरे लिए ये जान भी क़ुर्बान है
मेरी ग़ज़ल का बस तू ही उनवान है
समझी नहीं उसने ये बातें अन-कही
मासूम है कितनी सनम नादान है
मैं सोचता हूँ सब ख़यालों में तुझे
जाऊँ जहाँ बस तेरा ही गुन-गान है
सब नाम से तेरे बुलाते हैं मुझे
अब नाम तेरा ये मेरी पहचान है
आ जा ऐ जान-ए-जाँ न तड़पा यूँ मुझे
ये मेरा घर तेरे बिना सुनसान है
"मोईन" को अच्छा कहो चाहे बुरा
इसके लबों पे हर घड़ी मुस्कान है
बस इक यही रिश्ता निभाना है मुझे
अब उसकी हाँ में हाँ मिलाना है मुझे
देखे नहीं थे ख़्वाब मैंने वस्ल के
दिल हिज्र के लायक़ बनाना है मुझे
उसके लबों पर सेहरा की बातें हैं सो
मजनू सिफ़त खुद को बनाना है मुझे
वो संग दिल है ये सभी को है ख़बर
है मोम लहजा ये बताना है मुझे
क्या रेल से आवाज़ देता है कोई
क्या पटरियों पर लेट जाना है मुझे
उससे वफ़ा की अब तवक़्क़ो भी नहीं
अब ज़ख्म दिल का ख़ुद छुपाना है मुझे
दिल को अज़ाखाना बनाना है मेरे
अब सोग यूँ उसका मनाना है मुझे
मोईन उसको तो तमाशे भाते हैं
अंगारों की बारिश में आना है मुझे