अक्सर ही ज़ख़्म इश्क़ में पाले हैं औरतें
पर कितने टूटे मर्द सँभाले हैं औरतें
पर कितने टूटे मर्द सँभाले हैं औरतें
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दश्त किनारे इश्क़ पुकारें और कहें ये तुम ही हो
हर मरहम का घाव लगा लें और कहें ये तुम ही हो
हर मरहम का घाव लगा लें और कहें ये तुम ही हो
सबने क्या क्या रूप गढ़े हैं तेरी हुस्न बयानी में
हम दरिया से चाँद निकालें और कहें ये तुम ही हो
जितने इश्क़ कहें हों सबने और सुनें हों जितने भी
सबकी इक तस्वीर बना लें और कहें ये तुम ही हो
दुनिया की फुलवारी में जो सब से सुंदर तितली हो
उस तितली का हुस्न सँवारें और कहें ये तुम ही हो
जिस चिड़िया ने पिंजर तोड़ा इश्क़ किया आज़ाद हुई
उस चिड़िया के पंख निहारें और कहें ये तुम ही हो
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सोचा था इश्क़ होगा नहीं इक परी के बा'द
पर प्यास और बढ़ गई है उस नदी के बा'द
पर प्यास और बढ़ गई है उस नदी के बा'द
नाकाम हो जो इश्क़ में तो शा'इरी करो
जादूगरी से काम लो चारागरी के बा'द
तब क्या करेगा दोस्त अगर वो नहीं मिली
जो ज़िन्दगी तू चाहता है ख़ुद-कुशी के बा'द
फिर भी यक़ीन कर रहा हूँ उस ख़ुदा पे मैं
जो बेबसी बना रहा है आदमी के बा'द
कुछ ज़ख़्म मुस्कुराहटों के ऐसे रह गए
जैसे कि तीरगी के निशाँ चाँदनी के बा'द
ये दिलजलों की फ़ौज मेरे साथ जाएगी
कुछ भी नहीं बचेगा यहाँ शा'इरी के बा'द
हम इश्क़ से निकल चुकी अफ़सुर्दगी में हैं
इक अजनबी के साथ हैं इक अजनबी के बा'द
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जब रस्तों को तकने वाला हार गया
एक मुसाफ़िर चलता चलता हार गया
एक मुसाफ़िर चलता चलता हार गया
इक सफ़हे पर एक कहानी, इश्क़ लिखो
पेज़ पलट कर बा'द में लिखना, हार गया
कमज़ोरों से कहना इश्क़ मुक़म्मल था
सच सुनने वालों से कहना हार गया
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