दिल बाँध के रखा है रखा है फ़लक पे सर
मंज़िल तो दिख रही है मगर खो गया है घर
मंज़िल तो दिख रही है मगर खो गया है घर
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आज क़लम को उर्दू से तर कर लूँगा
नज़्म को फिर काग़ज़ के दिल में भर लूँगा
नज़्म को फिर काग़ज़ के दिल में भर लूँगा
गाँव में पुरखों का वो बड़ा घर जो बिक जाए
शहर में फिर जा के छोटा सा घर लूँगा
दिल पर तारी है उस बच्चे का रोना
अब अपने दामन में उस को धर लूँगा
अपने बदन की क़ैद में कब से हूँ मैं बंद
बह जाऊँगा ख़ुद को समुंदर कर लूँगा
मेरे हम-दम बेबाकी से कर ले बहस
हो इल्ज़ाम कोई मैं अपने सर लूँगा
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अना को कुछ इस तरह से मात कर लो
ज़बाँ से नहीं दिल से कुछ बात कर लो
ज़बाँ से नहीं दिल से कुछ बात कर लो
चुभन है बहुत चाँद की रौशनी में
जला के दिया नर्म ये रात कर लो
कसे हैं बहुत तंज़ इस ज़िंदगी ने
लड़ो ज़िंदगी से इसे घात कर लो
वो हमदर्द इंसाँ बचे ही कहाँ हैं
फ़रिश्ता-सिफ़त ख़ुद की ही ज़ात कर लो
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माज़ी की याद से हम गुलफ़ाम हो गए
थे सख़्त ख़िश्त जैसे अब ख़ाम हो गए
थे सख़्त ख़िश्त जैसे अब ख़ाम हो गए
हैं रास्ते बहुत पर कैसे चलूँ यहाँ
मुश्किल बहुत ही चलना दो गाम हो गए
आला सनद मिले थे पढ़ लिख के जो हमें
वैसे सनद तो घर घर में आम हो गए
सब अब लगे बुलाने ताज़ा खिताबों से
बेकार और निकम्मा कुछ नाम हो गए
जीते हैं अब तो अपनों के वास्ते मगर
दिल और समझ से कब के हम साम हो गए
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