आज क़लम को उर्दू से तर कर लूँगा
नज़्म को फिर काग़ज़ के दिल में भर लूँगा
गाँव में पुरखों का वो बड़ा घर जो बिक जाए
शहर में फिर जा के छोटा सा घर लूँगा
दिल पर तारी है उस बच्चे का रोना
अब अपने दामन में उस को धर लूँगा
अपने बदन की क़ैद में कब से हूँ मैं बंद
बह जाऊँगा ख़ुद को समंदर कर लूँगा
मेरे हम-दम बेबाकी से कर ले बहस
हो इल्ज़ाम कोई मैं अपने सर लूँगा
अना को कुछ इस तरह से मात कर लो
ज़बाँ से नहीं दिल से कुछ बात कर लो
चुभन है बहुत चाँद की रौशनी में
जला के दिया नर्म ये रात कर लो
कसे हैं बहुत तंज़ इस ज़िंदगी ने
लड़ो ज़िंदगी से इसे घात कर लो
वो हमदर्द इंसाँ बचे ही कहाँ हैं
फ़रिश्ता-सिफ़त ख़ुद की ही ज़ात कर लो
माज़ी की याद से हम गुलफ़ाम हो गए
थे सख़्त ख़िश्त जैसे अब ख़ाम हो गए
हैं रास्ते बहुत पर कैसे चलूँ यहाँ
मुश्किल बहुत ही चलना दो गाम हो गए
आला सनद मिले थे पढ़ लिख के जो हमें
वैसे सनद तो घर घर में आम हो गए
सब अब लगे बुलाने ताज़ा खिताबों से
बेकार और निकम्मा कुछ नाम हो गए
जीते हैं अब तो अपनों के वास्ते मगर
दिल और समझ से कब के हम साम हो गए
कभी तू भी हँसा कर क्या फ़क़त रोने ही आया है
खिली है वो ज़मीं भी जिस ने सागर को बहाया है
ख़ुद से ख़ुद की लड़ाई का अपना ही मज़ा है
फिर शिकवा न किसी से बस ख़ुद को ही सज़ा है
"1947 की तक़सीम और इंसाँ"
इंसाँ कुछ यहाँ से निकले वहाँ से कुछ आए
एक दूजे से मिले लेकिन सरहद के साए
इंसाँ काटे इंसाँ को और कोहराम मचाए
कुछ ज़ख़्मी कुछ मर गए किस को कौन बचाए
कुछ ज़िंदा कुछ मुर्दा राह में गिरते जाए
जिस्म ही जिस्म हैं रूह कहीं न नज़र आ पाए
कौन किसे अब देखे सँभाले समझाए
होश ही गुम है होश कहाँ से अब लाए
ख़ून से धरती माँ सुर्ख़ अब होती जाए
रोते हैं बच्चे कई माँ कहाँ है हाए
ज़र्द से चेहरे उजड़ी हवाएँ नज़र को न भाए
ताज़ा कोई हवा बस इस सरहद को मिटाए
दिए हैं ज़ख़्म इतने रोग भी कोई दिया होता
न रहती चाह कोई और न ज़ख़्मों को सिया होता