Darpan

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    मुक़र्रर दिन नहीं तो लम्हा-ए-इमकान में आओ
    अगर तुम मिल नहीं सकती तो मेरे ध्यान में आओ

    बला की ख़ूबसूरत लग रही हो आज तो जानाँ
    मुझे इक बात कहनी थी तुम्हारे कान में.. आओ

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    उनको दूर किया जाता है जो बरसों के साथी हैं
    और अनजाने लोगों की आपस में शादी होती है

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    महीनों तक रहा करते थे सब मेहमान आँखों में,
    मग़र अब ख़्वाब भी आते नहीं वीरान आँखों में

    ज़मान ए हिज्र कहने को रिवाज़ ए इश्क़ ही तो है,
    मग़र क्या क्या नहीं होता है इस दौरान आँखों में

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    एक तितली से वादा है सो गुलशन में,
    ग़लती से भी ख़ार नहीं देखूँगा मैं

    (ख़ार- काँटें )

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    पहले पहले दिल लगता था अब तो सिर्फ़ दिमाग़ लगे
    क्या मतलब ऐसे रिश्ते पर फूल खिले या दाग़ लगे

    इसमें ऐसी तारीक़ी है जिससे सब घबराते हैं
    दश्त वगरना सबको अपने घर का गुलशन-बाग़ लगे

    मुमकिन है तुमको पहले से और ज़्यादा उलझा दे
    जो दिखने में इस गुत्थी का सबसे अहम सुराग़ लगे

    मुझसे पहले इसके होंठो को गीला कर दे साक़ी
    मुझसे उम्दा प्यासा तो ये मय का ख़ुश्क अयाग़ लगे

    एक नज़र पड़ जाए उसकी जिसकी ख़ातिर पहना है
    फिर चाहे तो इस कुर्ते में आग लगे या दाग़ लगे

    उसकी आँखें पाकीज़ा हैं इतनी पाकीज़ा 'दर्पन'
    वो देखे तो उसको काला पत्थर एक चिराग़ लगे

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    दोस्त नहीं थे लड़ते भी थे यानी दुश्मन थे
    कुछ दिन पहले हम दोनों भी जानी दुश्मन थे

    फिर इक दिन जब मैंने लावा देखा चौक गया
    मुझको ये लगता था आग और पानी दुश्मन थे

    दोस्त मिले हैं तो मुश्किल ने दस्तक दी है अब
    जब जीने में होती थी आसानी, दुश्मन थे

    बेहोशी में सोच रहे थे जीत गए हम जंग
    आँख खुली तो हुई बड़ी हैरानी.. दुश्मन थे

    दर्पन ने लोगों से या तो इश्क़ किया या बैर
    दोस्त नहीं थे इसके सीधे मानी - दुश्मन थे

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    इश्क़ में धोखा खाने वाले बिल्कुल भी मायूस न हो
    इस रस्ते में थोड़ा आगे मयख़ाना भी आता है

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    कभी तीखी, कभी शीरीं, कभी हस्सास लगती है
    वो इक लड़की जो हर लहजे में सबको ख़ास लगती है

    बला की तिश्नगी आँखों में लेकर फिर रही है वो
    जिसे भी देख लेती है उसे फिर प्यास लगती है

    उसी की शोख़ियों से बाग़ का हर फूल जलता है
    उसी की उंगलियों पे तितलियों की क्लास लगती है

    मेरी नज़रों के चारों सम्त उसकी याद बिखरी है
    मुझे अब हर घड़ी उससे मिलन की आस लगती है

    उसी ने हिज्र को भी वस्ल जैसा कर दिया 'दर्पन
    वो जितना दूर होती है, वो उतना पास लगती है

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    इश्क़ हमारा चाँद सितारे छू लेगा
    घुटनों पर आकर इज़हार किया हमने

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    घर आते आते सौदागर हो जाऊं
    इतना भी बाज़ार नहीं देखूंगा मैं

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