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मिरी उदासी का नक़्श-ए-पा है उदास लफ़्ज़ों का एक जंगल
ये ग़म की रातों को जानता है उदास लफ़्ज़ों का एक जंगल
ये ग़म की रातों को जानता है उदास लफ़्ज़ों का एक जंगल
किसी की आँखों में धीरे धीरे उतर रहा है नमी का बादल
क़लम से किस के निकल रहा है उदास लफ़्ज़ों का एक जंगल
शिकस्ता काग़ज़ पर आँसुओं का बना हुआ है जो एक तालाब
वो मेरी आँखों से बह रहा है उदास लफ़्ज़ों का एक जंगल
उठाई कल रात डाइरी और मैं ने कर डाली डाली आतिश
सो साथ उस के ही जल गया है उदास लफ़्ज़ों का एक जंगल
कि दिल में जितनी अज़िय्यतें थीं क़लम से 'ताहिर' उन्हें लिखा है
ग़ज़ल की सूरत में ढल चुका है उदास लफ़्ज़ों का एक जंगल
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इक ग़म की कहानी है औराक़-ए-शिकस्ता पर
और दिल की ज़बानी है औराक़-ए-शिकस्ता पर
और दिल की ज़बानी है औराक़-ए-शिकस्ता पर
हाल अपना सुनाना है अश'आर की सूरत में
ये उम्र गँवानी है औराक़-ए-शिकस्ता पर
तहरीर पे धब्बों की सूरत जो मुनक़्क़श है
वो आँखों का पानी है औराक़-ए-शिकस्ता पर
रुकना भी अगर चाहूँ मुझ से न रुका जाए
ये कैसी रवानी है औराक़-ए-शिकस्ता पर
'ताहिर' मिरी आँखों में पोशीदा रही है जो
मूरत वो बनानी है औराक़-ए-शिकस्ता पर
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गली गली में उतर चुके हैं किताब-आँखों के ज़िंदा नौहे
हसीन चेहरों का सुर्ख़ मातम शराब-आँखों के ज़िंदा नौहे
हसीन चेहरों का सुर्ख़ मातम शराब-आँखों के ज़िंदा नौहे
ज़मीं के सीने में ज़िंदा हैं जो अगर समाअ'त है सुन सको तो
मिरी निगाहों से आज सुन लो हिजाब-आँखों के ज़िंदा नौहे
कि मेरी ग़ज़लों में मेरी नज़्मों में कर्ब आ कर सिमट गया है
मिरे क़लम से निकल रहे हैं जनाब आँखों के ज़िंदा नौहे
ये किस के दिल में उतर रहा है अज़ाब आँखों का अश्क बन कर
ये किस के चेहरे से कर रहे हैं ख़िताब आँखों के ज़िंदा नौहे
मैं 'ताहिर' उन के लबों की मुस्कान चाह कर भी न लिख सकूँगा
कि साथ मेरे रहे हैं जिन की गुलाब-आँखों के ज़िंदा नौहे
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