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अक्स कितने उतर गए मुझ में
फिर न जाने किधर गए मुझ में
फिर न जाने किधर गए मुझ में
मैं ने चाहा था ज़ख़्म भर जाएँ
ज़ख़्म ही ज़ख़्म भर गए मुझ में
मैं वो पल था जो खा गया सदियाँ
सब ज़माने गुज़र गए मुझ में
ये जो मैं हूँ ज़रा सा बाक़ी हूँ
वो जो तुम थे वो मर गए मुझ में
मेरे अंदर थी ऐसी तारीकी
आ के आसेब डर गए मुझ में
पहले उतरा मैं दिल के दरिया में
फिर समुंदर उतर गए मुझ में
कैसा मुझ को बना दिया 'अम्मार'
कौन सा रंग भर गए मुझ में
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इसी फ़कीर की गफ़लत से आगही ली है
मेरे चराग़ से सूरज ने रौशनी ली है
मेरे चराग़ से सूरज ने रौशनी ली है
गली-गली में भटकता है शोर करता हुआ
हमारे इश्क़ ने सस्ती शराब पी ली है
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एक दरवेश को तिरी ख़ातिर
सारी बस्ती से इश्क़ हो गया है
सारी बस्ती से इश्क़ हो गया है
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