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अगर है ज़िंदगी इक जश्न तो ना-मेहरबाँ क्यूँ है
फ़सुर्दा रंग में डूबी हुई हर दास्ताँ क्यूँ है
फ़सुर्दा रंग में डूबी हुई हर दास्ताँ क्यूँ है
तुम्हें हम से मोहब्बत है हमें तुम से मोहब्बत है
अना का दायरा फिर भी हमारे दरमियाँ क्यूँ है
वही सब कुछ रज़ा उस की तो फिर दिल में गुमाँ क्यूँ है
सवालों और जवाबों से परेशाँ मेरी जाँ क्यूँ है
हर इक मंज़र के पस-मंज़र में तेरा ही करिश्मा है
यक़ीनन ख़ालिक़-ए-कुन तू तो आँखों से निहाँ क्यूँ है
तुझी को है मुयस्सर हर बुराई का दमन करना
तो ना-इंसाफ़ियों के दौर में तू बे-ज़बाँ क्यूँ है
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ये आरज़ू है कि अब कोई आरज़ू न रहे
किसी सफ़र किसी मंज़िल की जुस्तुजू न रहे
किसी सफ़र किसी मंज़िल की जुस्तुजू न रहे
अजीब दिल है इसी दिल का अब तक़ाज़ा है
किसी भी बज़्म में अब उस की गुफ़्तुगू न रहे
मज़ा तभी है मोहब्बत में ग़र्क़ होने का
मैं डूब जाऊँ तो ये हो कि तू भी तू न रहे
बताओ उन की इबादत क़ुबूल क्या होगी
नमाज़-ए-इश्क़ में जो लोग बा-वज़ू न रहे
ख़ुदा बना दिया उन को मेरी मोहब्बत ने
हमेशा दिल में रहे और रू-ब-रू न रहे
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कम्बख़्त दिल ने इश्क़ को वहशत बना दिया
वहशत को हम ने बाइस-ए-रहमत बना दिया
वहशत को हम ने बाइस-ए-रहमत बना दिया
क्या क्या मुग़ालते दिए दौर-ए-जदीद ने
नफ़रत को प्यार प्यार को नफ़रत बना दिया
हम ने हज़ार फ़ासले जी कर तमाम शब
इक मुख़्तसर सी रात को मुद्दत बना दिया
ऐ जान अपने दिल पे मुझे नाज़ क्यूँ न हो
इक ख़्वाब था कि जिस को हक़ीक़त बना दिया
मख़्सूस हद पे आ गई जब बे-रुख़ी तिरी
उस हद को हम ने हासिल-ए-क़िस्मत बना दिया
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बन गए दिल के फ़साने क्या क्या
खुल गए राज़ न जाने क्या क्या
खुल गए राज़ न जाने क्या क्या
कौन था मेरे अलावा उस का
उस ने ढूँडे थे ठिकाने क्या क्या
रहमत-ए-इश्क़ ने बख़्शे मुझ को
उस की यादों के ख़ज़ाने क्या क्या
आज रह रह के मुझे याद आए
उस के अंदाज़ पुराने क्या क्या
रक़्स करती हुई यादें उन की
और दिल गाए तराने क्या क्या
तेरा अंदाज़ निराला सब से
तीर तो एक निशाने क्या क्या
आरज़ू मेरी वही है लेकिन
उस को आते हैं बहाने क्या क्या
राज़-ए-दिल लाख छुपाया लेकिन
कह दिया उस की अदा ने क्या क्या
दिल ने तो दिल ही की मानी 'मीता'
अक़्ल देती रही ता'ने क्या क्या
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ज़िंदगी अपना सफ़र तय तो करेगी लेकिन
हम-सफ़र आप जो होते तो मज़ा और ही था
हम-सफ़र आप जो होते तो मज़ा और ही था
का'बा ओ दैर में अब ढूँड रही है दुनिया
जो दिल ओ जान में बस्ता था ख़ुदा और ही था
अब ये आलम है कि दौलत का नशा तारी है
जो कभी इश्क़ ने बख़्शा था नशा और ही था
दूर से यूँही लगा था कि बहुत दूरी है
जब क़रीब आए तो जाना कि गिला और ही था
मेरे दिल ने तो तुझे और ही दस्तक दी थी
तू ने ऐ जान जो समझा जो सुना और ही था
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