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नज़र नज़र में अदा-ए-जमाल रखते थे
हम एक शख़्स का कितना ख़याल रखते थे
हम एक शख़्स का कितना ख़याल रखते थे
जबीं पे आने न देते थे इक शिकन भी कभी
अगरचे दिल में हज़ारों मलाल रखते थे
ख़ुशी उसी की हमेशा नज़र में रहती थी
और अपनी क़ुव्वत-ए-ग़म भी बहाल रखते थे
बस इश्तियाक़-ए-तकल्लुम में बार-हा हम लोग
जवाब दिल में ज़बाँ पर सवाल रखते थे
उसी से करते थे हम रोज़ ओ शब का अंदाज़ा
ज़मीं पे रह के वो सूरज की चाल रखते थे
जुनूँ का जाम मोहब्बत की मय ख़िरद का ख़ुमार
हमीं थे वो जो ये सारे कमाल रखते थे
छुपा के अपनी सिसकती सुलगती सोचों से
मोहब्बतों के उरूज ओ ज़वाल रखते थे
कुछ उन का हुस्न भी था मावरा मिसालों से
कुछ अपना इश्क़ भी हम बे-मिसाल रखते थे
ख़ता नहीं जो खिले फूल राह-ए-सरसर में
ये जुर्म है कि वो फ़िक्र-ए-मआल रखते थे
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कहीं लोग तन्हा कहीं घर अकेले
कहाँ तक मैं देखूँ ये मंज़र अकेले
कहाँ तक मैं देखूँ ये मंज़र अकेले
गली में हवाओं की सरगोशियाँ हैं
घरों में मगर सब सनोबर अकेले
नुमाइश हज़ारों निगाहों ने देखी
मगर फूल पहले से बढ़ कर अकेले
अब इक तीर भी हो लिया साथ वर्ना
परिंदा चला था सफ़र पर अकेले
जो देखो तो इक लहर में जा रहे हैं
जो सोचो तो सारे शनावर अकेले
तिरी याद की बर्फ़-बारी का मौसम
सुलगता रहा दिल के अंदर अकेले
इरादा था जी लूँगा तुझ से बिछड़ कर
गुज़रता नहीं इक दिसम्बर अकेले
ज़माने से 'क़ासिर' ख़फ़ा तो नहीं हैं
कि देखे गए हैं वो अक्सर अकेले
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