कहते हैं इन शाख़ों पर फल फूल भी आते थे
अब तो पत्ते झड़ते हैं या पत्थर गिरते हैं
नज़र नज़र में अदा-ए-जमाल रखते थे
हम एक शख़्स का कितना ख़याल रखते थे
जबीं पे आने न देते थे इक शिकन भी कभी
अगरचे दिल में हज़ारों मलाल रखते थे
ख़ुशी उसी की हमेशा नज़र में रहती थी
और अपनी क़ुव्वत-ए-ग़म भी बहाल रखते थे
बस इश्तियाक़-ए-तकल्लुम में बार-हा हम लोग
जवाब दिल में ज़बाँ पर सवाल रखते थे
उसी से करते थे हम रोज़ ओ शब का अंदाज़ा
ज़मीं पे रह के वो सूरज की चाल रखते थे
जुनूँ का जाम मोहब्बत की मय ख़िरद का ख़ुमार
हमीं थे वो जो ये सारे कमाल रखते थे
छुपा के अपनी सिसकती सुलगती सोचों से
मोहब्बतों के उरूज ओ ज़वाल रखते थे
कुछ उन का हुस्न भी था मावरा मिसालों से
कुछ अपना इश्क़ भी हम बे-मिसाल रखते थे
ख़ता नहीं जो खिले फूल राह-ए-सरसर में
ये जुर्म है कि वो फ़िक्र-ए-मआल रखते थे
नाम लिख लिख के तिरा फूल बनाने वाला
आज फिर शबनमीं आँखों से वरक़ धोता है
तेरी आवाज़ को इस शहर की लहरें तरसती हैं
ग़लत नंबर मिलाता हूँ तो पहरों बात होती है
ये भी इक रंग है शायद मिरी महरूमी का
कोई हँस दे तो मोहब्बत का गुमाँ होता है
बारूद के बदले हाथों में आ जाए किताब तो अच्छा हो
ऐ काश हमारी आँखों का इक्कीसवाँ ख़्वाब तो अच्छा हो
कहीं लोग तन्हा कहीं घर अकेले
कहाँ तक मैं देखूँ ये मंज़र अकेले
गली में हवाओं की सरगोशियाँ हैं
घरों में मगर सब सनोबर अकेले
नुमाइश हज़ारों निगाहों ने देखी
मगर फूल पहले से बढ़ कर अकेले
अब इक तीर भी हो लिया साथ वर्ना
परिंदा चला था सफ़र पर अकेले
जो देखो तो इक लहर में जा रहे हैं
जो सोचो तो सारे शनावर अकेले
तिरी याद की बर्फ़-बारी का मौसम
सुलगता रहा दिल के अंदर अकेले
इरादा था जी लूँगा तुझ से बिछड़ कर
गुज़रता नहीं इक दिसम्बर अकेले
ज़माने से 'क़ासिर' ख़फ़ा तो नहीं हैं
कि देखे गए हैं वो अक्सर अकेले
कश्ती भी नहीं बदली दरिया भी नहीं बदला
और डूबने वालों का जज़्बा भी नहीं बदला
तस्वीर नहीं बदली शीशा भी नहीं बदला
नज़रें भी सलामत हैं चेहरा भी नहीं बदला
है शौक़-ए-सफ़र ऐसा इक उम्र से यारों ने
मंज़िल भी नहीं पाई रस्ता भी नहीं बदला
बेकार गया बन में सोना मिरा सदियों का
इस शहर में तो अब तक सिक्का भी नहीं बदला
बे-सम्त हवाओं ने हर लहर से साज़िश की
ख़्वाबों के जज़ीरे का नक़्शा भी नहीं बदला
बग़ैर उस के अब आराम भी नहीं आता
वो शख़्स जिस का मुझे नाम भी नहीं आता
उसी की शक्ल मुझे चाँद में नज़र आए
वो माह-रुख़ जो लब-ए-बाम भी नहीं आता
करूँगा क्या जो मोहब्बत में हो गया नाकाम
मुझे तो और कोई काम भी नहीं आता
बिठा दिया मुझे दरिया के उस किनारे पर
जिधर हुबाब तही-जाम भी नहीं आता
चुरा के ख़्वाब वो आँखों को रेहन रखता है
और उस के सर कोई इल्ज़ाम भी नहीं आता
करूँगा क्या जो मोहब्बत में हो गया नाकाम
मुझे तो और कोई काम भी नहीं आता