खो गई ग़ैरत-ए-दिल ज़ौक़-ए-तलब बाक़ी है
कैसे मर जाऊँ कि जीने का सबब बाक़ी है
कैसे मर जाऊँ कि जीने का सबब बाक़ी है
जल्वा-ए-सुब्ह का मंज़र है गुलिस्ताँ में तो क्या
आशियानों में अभी ज़ुल्मत-ए-शब बाक़ी है
नश्र हो जाएगी ख़ुद कुल्फ़त-ए-दौराँ की हदीस
तेरे शाइ'र में अगर जुरअत-ए-लब बाक़ी है
हुस्न और इश्क़ में इक ख़ास है रब्त-ए-उल्फ़त
दिल सलामत है तो फिर चश्म-ए-ग़ज़ब बाक़ी है
कूचा-ए-इश्क़ में दिल आज भी है सरगर्दां
अब भी वो शेफ़्ता-ए-आरिज़-ओ-लब बाक़ी है
जब तलक दहर में ज़िंदा है ज़बान-ए-उर्दू
रौनक़-ए-अंजुमन-ए-शेर-ओ-अदब बाक़ी है
गर्दिश-ए-वक़्त की रफ़्तार बताती है 'सबा'
चश्मक-ए-सोज़-ए-अलम साज़-ए-तरब बाक़ी है
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बे-मा'नी ला-हासिल रद्दी शे'रों का है जाल उधर
जो चीज़ें बे-कार हैं प्यारे उन चीज़ों को डाल उधर
जो चीज़ें बे-कार हैं प्यारे उन चीज़ों को डाल उधर
कुछ तज्वीज़ें पास करेगा वक़्त के हाथों ये इजलास
मजबूर-ओ-नादार इधर हैं आसूदा ख़ुश-हाल उधर
बीच में हाइल कर दे कोई काश तकल्लुफ़ की दीवार
उधर है रेला गुल-चीनों का और गुलों में काल इधर
ख़ून-ए-तमन्ना की सुर्ख़ी से दिल की हिकायत है रंगीं
दामन की तक़दीर इधर है गुलशन का इक़बाल उधर
उन की बज़्म से आने वाले थाम के दिल फ़रमाते हैं
जाने वालो उधर न जाओ जुर्म है अर्ज़-ए-हाल उधर
जल्सा-ए-ग़म की तय्यारी में उधर हैं जीते जी मसरूफ़
पैदाइश का जश्न मनाया यारों ने हर साल उधर
इक मुद्दत से देख रहा हूँ होता है हर बार यही
इधर 'सबा' ने ख़्वाब सजाया वक़्त ने बदली चाल उधर
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अश्कों से जो नहाएँ लहू से वुज़ू करें
क़ुर्बान-गाह-ए-फ़र्ज़ की वो गुफ़्तुगू करें
क़ुर्बान-गाह-ए-फ़र्ज़ की वो गुफ़्तुगू करें
सहन-ए-चमन में ढूँड चुके हुस्न-ए-इर्तिक़ा
सहरा में अब तजस्सुस-ए-जोश-ए-नुमू करें
इस शहर-ए-बे-अमाँ में जो सद-चाक हो गया
उस दामन-ए-हयात को कैसे रफ़ू करें
जब हुस्न की असास दिल-ए-बे-यक़ीं पे है
फिर किस लिए हम अपने जिगर को लहू करें
पैमाना-ए-ख़ुलूस नहीं जिस का दिल 'सबा'
उस शाहिद-ए-जमाल की क्या आरज़ू करें
Read Fullसहरा में अब तजस्सुस-ए-जोश-ए-नुमू करें
इस शहर-ए-बे-अमाँ में जो सद-चाक हो गया
उस दामन-ए-हयात को कैसे रफ़ू करें
जब हुस्न की असास दिल-ए-बे-यक़ीं पे है
फिर किस लिए हम अपने जिगर को लहू करें
पैमाना-ए-ख़ुलूस नहीं जिस का दिल 'सबा'
उस शाहिद-ए-जमाल की क्या आरज़ू करें
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नज़र के सुर्ख़ डोरे दिल में उतरे
मुसाफ़िर दामन-ए-साहिल में उतरे
मुसाफ़िर दामन-ए-साहिल में उतरे
फ़ज़ाओं में उड़ानें भरने वाले
पतंगे गोशा-ए-महफ़िल में उतरे
खनकते नुक़रई सिक्कों के ताइर
तिलाई कासा-ए-साइल में उतरे
कई ख़ंजर निगाह-ए-ख़िशमगीं के
ब-यक लम्हा दिल-ए-बिस्मिल में उतरे
कफ़न-बर-दोश थे अहल-ए-मोहब्बत
बक़ा की जावेदाँ मंज़िल में उतरे
न भूले अहद-ए-हाज़िर के तक़ाज़े
ग़ज़ल जब फ़िक्र की महमिल में उतरे
'सबा' के साथ रहमत के फ़रिश्ते
अचानक कूचा-ए-क़ातिल में उतरे
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क़लम से राब्ता-ए-रंग-ओ-आब टूट गया
किसी मुसव्विर-ए-फ़ितरत का ख़्वाब टूट गया
किसी मुसव्विर-ए-फ़ितरत का ख़्वाब टूट गया
ये दिल कि संग न था एक आबगीना था
न ला सका तिरे जल्वों की ताब टूट गया
सवाल ये है कि मैं ने किसी से क्या पाया
जवाब ये है कि बरसों का ख़्वाब टूट गया
हुआ वो मुझ से मुख़ातब तो यूँ लगा जैसे
कोई सितारा-ए-गर्दूं-रिकाब टूट गया
उसूल-ए-आमद-ओ-रफ़्त-ए-बहार क्या कहिए
कली जो शाख़ पे आई गुलाब टूट गया
ग़ज़ल के शे'र जो रुस्वा-ए-इंतिख़ाब हुए
भरम नज़र का पस-ए-इंतिख़ाब टूट गया
रह-ए-हवस में थी हाइल ज़मीर की आवाज़
मगर तक़द्दुस-ए-अहद-ए-शबाब टूट गया
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