ज़िंदगी झूल रही है ब-सलीब-ए-दौराँ

क्यूँ न अंगुश्त-ब-दंदाँ हो तबीब-ए-दौराँ

जौहर-ए-सब्र ने देखा ब-निगाह-ए-तहसीं
मंज़र-ए-आम पे आया जो ग़रीब-ए-दौराँ

बे-अदब लगता है दुनिया-ए-अदब का माहौल
शाइ'र-ए-अस्र से उलझा है अदीब-ए-दौराँ

चेहरा-ए-वक़्त तिरी पर्दा-कुशाई कर के
हम ने हर दौर में पल्टा है नसीब-ए-दौराँ

तर्जुमान-ए-ग़म-ए-हस्ती है 'सबा' जिस का दिमाग़
चश्म-ए-बीना में वो शाइ'र है नक़ीब-ए-दौराँ

— Saba Naqvi

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