Mirza Ghalib

Top 10 of Mirza Ghalib

    हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
    तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है

    न शो'ले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा
    कोई बताओ कि वो शोख़-ए-तुंद-ख़ू क्या है

    ये रश्क है कि वो होता है हम-सुख़न तुम से
    वगर्ना ख़ौफ़-ए-बद-आमोज़ी-ए-अदू क्या है

    चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
    हमारे जैब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है

    जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
    कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है

    रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
    जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

    वो चीज़ जिस के लिए हम को हो बहिश्त अज़ीज़
    सिवाए बादा-ए-गुलफ़ाम-ए-मुश्क-बू क्या है

    पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो-चार
    ये शीशा ओ क़दह ओ कूज़ा ओ सुबू क्या है

    रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी
    तो किस उमीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है

    हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता
    वगर्ना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है

    Mirza Ghalib
    32 Likes

    पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है
    कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या

    Mirza Ghalib
    204 Likes

    मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे
    तू देख कि क्या रंग है तेरा, मेरे आगे

    Mirza Ghalib
    178 Likes

    इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
    वर्ना हम भी आदमी थे काम के

    Mirza Ghalib
    81 Likes

    कोई उम्मीद बर नहीं आती
    कोई सूरत नज़र नहीं आती

    मौत का एक दिन मुअय्यन है
    नींद क्यूँ रात भर नहीं आती

    आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
    अब किसी बात पर नहीं आती

    जानता हूँ सवाब-ए-ताअत-ओ-ज़ोहद
    पर तबीअत इधर नहीं आती

    है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ
    वर्ना क्या बात कर नहीं आती

    क्यूँ न चीख़ूँ कि याद करते हैं
    मेरी आवाज़ गर नहीं आती

    दाग़-ए-दिल गर नज़र नहीं आता
    बू भी ऐ चारागर नहीं आती

    हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
    कुछ हमारी ख़बर नहीं आती

    मरते हैं आरज़ू में मरने की
    मौत आती है पर नहीं आती

    काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
    शर्म तुम को मगर नहीं आती

    Mirza Ghalib
    28 Likes

    जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
    कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है

    Mirza Ghalib
    49 Likes

    इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'
    कि लगाए न लगे और बुझाए न बने

    Mirza Ghalib
    92 Likes

    हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
    दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है

    Mirza Ghalib
    484 Likes

    वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है
    कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं

    Mirza Ghalib
    64 Likes

    रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
    जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

    Mirza Ghalib
    48 Likes

Top 10 of Similar Writers