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हुस्न और इश्क़ की ग़फ़लत से डरा करते हैं
मेरे ग़म-ख़्वार अक़ीदत से डरा करते हैं
मेरे ग़म-ख़्वार अक़ीदत से डरा करते हैं
ज़ीस्त की अस्ल हक़ीक़त से डरा करते हैं
अब तो रहगीर भी हिजरत से डरा करते हैं
दिल-लगी ने नहीं आदत ने डराया हम को
लोग सिगरेट से नहीं लत से डरा करते हैं
आप इज़हार ए मुहब्बत से डरा करते थे
माज़रत हम तो मुहब्बत से डरा करते हैं
उन को बचपन में कभी माँ ने डराया होगा
वो सभी मर्द जो औरत से डरा करते हैं
जिस्म को बाप की दस्तार समझने वाले
पास आ कर भी शरारत से डरा करते हैं
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इश्क़ में हो के जो बदनाम नहीं आते हैं
उन के प्यालों में कभी ज़ाम नहीं आते हैं
उन के प्यालों में कभी ज़ाम नहीं आते हैं
लोग जो दौड़ यहाँ दौड़ रहे हैं हर पल
मुझ को ये सब रविश-ए-आम नहीं आते हैं
गाँव छोड़ा तो कटी रात ज़मीं पे मेरी
इस बड़े शहर में ख़य्याम नहीं आते हैं
रूह को लोग बनाने में लगे हैं पत्थर
अब अहिल्या के लिए राम नहीं आते हैं
शादी से पहले सभी लोग यही कहते हैं
मुझ को कोई भी बुरे काम नहीं आते हैं
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निकलकर क़ैद से बाहर नहीं आता
मेरे दर पर मेरा परवर नहीं आता
मेरे दर पर मेरा परवर नहीं आता
खिलौने ख़ुद बना कर खेलता था मैं
सभी के गाँव जादूगर नहीं आता
इशारों पर किसी के नाचता है वो
मेरे पत्तों में जो नंबर नहीं आता
तुम्हें इस ज़िंदगी का ग़म नहीं या'नी
तुम्हारी दाल में पत्थर नहीं आता
हमारे हिस्से में आवारगी आई
हमारे हिस्से कोई घर नहीं आता
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