इस ज़िंदगी को मौत से भी बद-तरीन देख

का'बे को जा रहे हैं यहाँ मुंकिरीन देख

इक बार उस ने आँख दिखाई थी मुझ को दोस्त
नीचे है उस की आज तलक आस्तीन देख

वो दोस्ती निभाएगा इस दुश्मनी के बा'द
अपने रक़ीब पर कभी कर के यक़ीन देख

मासूमियत भी मिट गईं नादानियाँ भी ख़त्म
इक हादसे ने कर दिया कितना ज़हीन देख

चालाकियाँ ये ख़्वाहिशें आदम से कहती हैं
बेहतर को पा लिया है तो अब बेहतरीन देख

फूलों का गोश्त नोच के काँटों को चुन लिया
ये तितलियाँ भी ख़ून की हैं शाइक़ीन देख

स्कूल के दिनों में जिन्हें देखते न थे
वो लड़कियाँ भी हो गईं कितनी हसीन देख

— Lalit Pandey

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