सबका यक़ीन बढ़ने लगा ख़ाकसार पर

या'नी कि चोट पड़ने लगी है दरार पर

जिस की रखी हो नींव यहाँ पासवर्ड से
कैसे मैं ऐतिबार करूँ ऐसे प्यार पर

वो शख़्स जिस ने रोज़ मुझे अनसुना किया
वो शख़्स कैसे लौट गया इक पुकार पर

चर्चे हमारी हार के होने लगे थे सो
सबने हमारा नाम लिखा इश्तिहार पर

इक लड़की की पसंद से शादी हुई है आज
या'नी कि दीप जलने लगे घर के द्वार पर

मैं ने ज़बान सौंप दी है उस के हाथ में
वो भी क़रार करने लगी है क़रार पर

वो मेरे साथ उतना ठहरती है जितना देर
इक बूँद ठहरी रहती है बिजली के तार पर

कुछ इस तरह वो होंठ पे रख कर गया है होंठ
रक्खे हों जैसे हाथ किसी ने गिटार पर

फिर से जवाब आने लगे हैं सवाल के
फिर से शराब चढ़ने लगी है ख़ुमार पर

— Lalit Pandey

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