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Navneet Vatsal Sahil

Top 10 of Navneet Vatsal Sahil

Navneet Vatsal Sahil

Top 10 of Navneet Vatsal Sahil

    यूँ कमी तो खलेगी मिरी
    तुम बिगाड़े हुए हो मिरे
    Navneet Vatsal Sahil
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    होंठों पर ख़ामोशी रखने वालों की
    इन आँखों में ग़म का दरिया पलता है
    Navneet Vatsal Sahil
    9
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    फूलों के नाज़ुक शानों पर है ख़ुश्बू
    वैसे तो ये तेरी ज़िम्मेदारी है

    अर्सा गुज़रा है सहरा में हम को पर
    महक अभी तक दोशीज़ा की तारी है
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    Navneet Vatsal Sahil
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    बेहोशी के आलम अब तक तारी हैं
    हम ने उस पर इतनी साँसे वारी हैं
    Navneet Vatsal Sahil
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    तुझ को देखना हम-आग़ोश न कर लें वो
    तू यूँ न जी शीशों का ललचाया कर
    Navneet Vatsal Sahil
    6
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    "धीमा ज़हर"
    उम्मीद-ओ-ख़्वाहिशें
    ज़िन्दगी जीने को अहम तो हैं मगर
    ये धीमा ज़हर होती हैं
    गर हो जाएँ ज़्यादा तो
    ख़त्म कर देती हैं
    धीरे-धीरे ख़ुशियों को
    पालने वाले इंसान को आख़िरश

    मैं ने भी मेरी जानाँ
    तुम से रखी थीं उम्मीदें
    तुम से पाली थीं ख़्वाहिशें
    अव्वल दर्ज़े की उम्मीदें
    अव्वल दर्ज़े की ख़्वाहिशें
    और अब ये हाल है जानाँ
    ख़ुशियों की राख पर ज़िन्दगी
    रोती-रोती धीमी मौत मर रही है
    जानाँ तुम ने मुझ को सिखलाया है
    उम्मीद-ओ-ख़्वाहिशें ज़हर होती हैं
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    Navneet Vatsal Sahil
    5
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    "आख़िरी सर्दी"
    सब तबाह-ओ-बर्बाद हो जाएगा
    ये सितम है कि
    इक दिन
    कोई तुम पर
    मरते-मरते मर जाएगा

    तुम से था वो जो
    सुरख़ाब चेहरा
    कि जिस पे तुम मरती थीं
    बेनूर हो जाएगा

    मेंरे चश्मों को
    बीनाई जो तुम ने
    की थी अता
    उस को देखना
    नमी लग जाएगी
    ज़ंग खा जाएगा

    एक दिल जिस को
    बरसों धड़काया तुम ने
    बेचैन-ओ-बेक़रार रखा
    वो भी जान क़रार पा जाएगा

    साँसें
    जो महकती रहीं हैं अभी तलक
    सो उन को भी
    सीने का एक ज़ख़्म खा जाएगा

    जिस जिस्म को
    गर्मी-ए-आग़ोश में
    कितनी सर्दियां तुम ने रखा था
    इस सर्दी
    शायद
    सर्द हो जाएगा
    असर खो जाएगा

    और आख़िरश एक लड़का
    जिस से तुम को निस्बत थी
    जिस को तुम से निस्बत है
    हिज़्र तुम्हारा खा जाएगा
    मर जाएगा

    एक लड़का
    बिछड़ कर तुम से
    इस सर्दी
    सुनो मुझ को ऐसा लगता है
    मर जाएगा
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    Navneet Vatsal Sahil
    4
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    "तुम कब आओगी"
    कितने दिन गुज़रे तुम्हें गए हुए
    तुम ने मुड़कर देखे हुए
    न कोई ख़त न कोई ख़बर ही भेजी तुम ने
    तुम जानती हो?
    तुम्हारे बा'द क्या हुआ

    वो बिल्लियां जो तुम्हारे होते हुए
    कोसों दूर रहती थी
    मेरे आस-पास घूमने लगी हैं

    कौए जो घर के ऊपर से
    गुज़रते तक न थे
    मुंडेर पर बैठे रहते हैं

    जाले जो तुम ने हटाये थे कभी
    मकड़ियों ने फिर से बना लिए हैं सारे घर में

    एक पेड़ जो सहन में
    तुम लगाकर गई थी
    दम तोड़ रहा है
    उसे पानी देने वाला कोई भी तो नहीं
    कुछ ख़बर भेजो अपनी
    "घर कब आओगी?"

    मैं थक चुका हूँ
    इन बिल्लियों, कौओ को भगाता हुआ
    जालों को हटाता पेड़ को बचाता हुआ

    एक दिया जो मुंतज़िर है
    बुझने को है
    इस की साँसों का तो इंतज़ाम भेजो
    झूठा सही इक पैग़ाम भेजो
    कि "तुम आओगी, तुम ज़रूर आओगी"
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    Navneet Vatsal Sahil
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    "इक ख़याल हक़ीक़त से बे-रब्त"
    बहुत देर हुई मैं एक ख़याल में गुम हूँ
    ख़याल भी क्या है
    बस इक ख़याल है
    हैरत है बहुत देर हुई
    पर मैं अभी तलक गुम हूँ
    उसी ख़याल में
    जो बस इक ख़याल है
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    Navneet Vatsal Sahil
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    "रोना ज़ब्त है"
    मैं पूछता हूँ ख़ुदा से
    वो ख़ुदा जो सबका है
    मेरा नईं
    ये अलग बात है जानाँ
    तुम भी ख़ुदा ही थीं मुझे
    इस लिए शायद अब मेरा
    कोई भी तो ख़ुदा नईं
    फिर भी पूछता हूँ
    क्या ये लोग
    कभी नहीं रोयेंगे?
    किसी रोज़
    इन के चश्में-तर नहीं होंगे?
    मैं पूछूँगा उस रोज़ जब इनका
    अपना इनसे छिन जाएगा
    रोते क्यूँ हो रोना ज़ब्त है
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    Navneet Vatsal Sahil
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