ख़ुदाया मुझे यूँ न हैरत से देखो
    यक़ीं तो करो बाख़ुदा बे-ख़ुदी है

    Shadab Shabbiri
    2 Likes

    थी किताबी किताब में गुज़री
    ज़िन्दगी सारी ख़्वाब में गुज़री

    उसके दरबार से रहा रिश्ता
    उम्र बस जी जनाब में गुज़री

    Shadab Shabbiri
    0 Likes

    क़ाएम रहे उसूल पे दोनों अख़ीर तक
    मैं भी अना परस्त था ग़ैरत उसे भी थी

    Shadab Shabbiri
    0 Likes

    आ इधर बैठ गुफ़्तगू कर लें
    यार जो भी हो यार हैं हम लोग

    Shadab Shabbiri
    0 Likes

    ख़्वाब में रात रू-ब-रू था वो
    जैसा सोचा था हू-ब-हू था वो

    Shadab Shabbiri
    1 Like

    इश्क़ को कार-ए-दिल्लगी समझा
    या ख़ुदा हम ये क्या समझ बैठे

    Shadab Shabbiri
    1 Like

    चार सू ग़म की आग फैली थी
    मोम जैसा पिघल गया हूँ मैं

    Shadab Shabbiri
    0 Likes

    जुनून-ए-इश्क़ में ये बेख़ुदी का आलम है
    ख़ुद अपने शहर में अपना मकान भूल गए

    Shadab Shabbiri
    0 Likes

    आज फिर याद आ गई उनकी
    फिर हुईं आज तर-बतर आँखें

    Shadab Shabbiri
    0 Likes

    जी रहा हूँ मैं ऐसे आलम में
    आप होते तो मर गए होते

    Shadab Shabbiri
    2 Likes

Top 10 of Similar Writers