By:
00:00/00:00
ख़ुदाया मुझे यूँ न हैरत से देखोयक़ीं तो करो बाख़ुदा बे-ख़ुदी है
थी किताबी किताब में गुज़रीज़िन्दगी सारी ख़्वाब में गुज़रीउसके दरबार से रहा रिश्ताउम्र बस जी जनाब में गुज़री
क़ाएम रहे उसूल पे दोनों अख़ीर तकमैं भी अना परस्त था ग़ैरत उसे भी थी
आ इधर बैठ गुफ़्तगू कर लेंयार जो भी हो यार हैं हम लोग
ख़्वाब में रात रू-ब-रू था वोजैसा सोचा था हू-ब-हू था वो
इश्क़ को कार-ए-दिल्लगी समझाया ख़ुदा हम ये क्या समझ बैठे
चार सू ग़म की आग फैली थीमोम जैसा पिघल गया हूँ मैं
जुनून-ए-इश्क़ में ये बेख़ुदी का आलम हैख़ुद अपने शहर में अपना मकान भूल गए
आज फिर याद आ गई उनकीफिर हुईं आज तर-बतर आँखें
जी रहा हूँ मैं ऐसे आलम मेंआप होते तो मर गए होते