10
3 Likes
परिंदों को शजर का दुख बताया है
ख़िज़ाँ में सारा जंगल रोने आया है
ख़िज़ाँ में सारा जंगल रोने आया है
ग़रीबी तोड़ कर रख देती है बंदा
नमक को छोड़ कर आँसू मिलाया है
ग़ज़ल का शौक़ कैसे पड़ गया हम को
ये किस के ग़म ने हम को इतना खाया है
9
2 Likes
बू-ए-मोहब्बत को जहाँ में फ़ैल जाने दो ज़रा
ये तितलियों को फिर गुल-ए-नर्गिस पे आने दो ज़रा
ये तितलियों को फिर गुल-ए-नर्गिस पे आने दो ज़रा
कब से शब-ए-उम्मीद हूँ दीदार की ख़ातिर तिरी
इक बार तो बंदे को हाल-ए-दिल सुनाने दो ज़रा
अब देखना है ये समुंदर किस तरफ़ ले जाता है
लहरों की बाहों में मिरी कश्ती को आने दो ज़रा
जो मुफ़्लिसी की आड़ में बचपन को भूले बैठे हैं
तालाब में फिरसे उन्हें गोते लगाने दो ज़रा
किस ने कहा फिरसे मोहब्बत की नहीं जा सकती है
ये ग़म-ज़दा लोगों को फिरसे दिल लगाने दो ज़रा
8
2 Likes
7
2 Likes
हम गली से उस की कुछ आँसू बहा के निकले हैं
इश्क़ कितना है हमें सब सच बता के निकले हैं
इश्क़ कितना है हमें सब सच बता के निकले हैं
उस की मर्ज़ी है वो चाहे या न चाहे हम को पर
उस की ख़ातिर हम तो अपना सब लुटा के निकले हैं
6
2 Likes
5
2 Likes
पास मेरे वो आ नहीं सकता
दूर उस से मैं जा नहीं सकता
दूर उस से मैं जा नहीं सकता
जब से मैं हारा हूँ मुहब्बत में
दिल कहीं भी लगा नहीं सकता
तेरे बिन मैं अधूरा सा लगता
हाथ तुझ से छुड़ा नहीं सकता
एक लड़की का हूँ मैं दीवाना
ख़ुद को पागल बता नहीं सकता
तेरी ख़ातिर मैं लाया हूँ कंगन
चाँद तारे मैं ला नहीं सकता
मैं ने रख दीं निकाल कर आँखें
अब वो मुझ को रुला नहीं सकता
शे'र लिखता हूँ ज़िंदगी पर मैं
बिन सुनाए मैं जा नहीं सकता
3
2 Likes
2
2 Likes










