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अक़्ल पर पत्थर पड़े हैं
भाई भाई से लड़े हैं
भाई भाई से लड़े हैं
पेड़ जो नफ़रत के हैं वो
मुँह उठाए क्यूँ खड़े हैं
लाशें ही लाशें बिछीं पर
आक़ा लड़ने पर अड़े हैं
ख़ुद की रोटी बाँट दें जो
दिल के तो वो ही बड़े हैं
चोर भी कलयुग में अब तो
तान कर सीना खड़े हैं
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Amit Gautam
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तुझ से मिलने की आस रहती है
और हमेशा ये प्यास रहती है
और हमेशा ये प्यास रहती है
ढूँढ़ने से भी वो नहीं मिलती
जो मेरे आस पास रहती है
मेरी दुल्हन बनेगी तू इक दिन
लड़की फिर क्यूँ उदास रहती है
उस को आवाज़ दो तो आएगा
दिल को इस की कयास रहती है
हार कर थक गया हूँ मैं लेकिन
जीत की अब भी आस रहती है
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तुम बतलाओ भाती हैं क्या ग़ज़लें मेरी
दिल को भी छू जाती हैं क्या ग़ज़लें मेरी
दिल को भी छू जाती हैं क्या ग़ज़लें मेरी
जब रातों को सोती हो तुम आँखें मीचे
ख़्वाबों में भी आती हैं क्या ग़ज़लें मेरी
पहले जैसे मुस्काती थी ग़ज़लें सुन कर
दिल अब भी धड़काती हैं क्या ग़ज़लें मेरी
अब तो कोसों दूरी हम में रहती है पर
तुम को मुझ तक लाती हैं क्या ग़ज़लें मेरी
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बैठे बैठे उफ़ ये आफ़त हो गई
एक दिन हम को मुहब्बत हो गई
एक दिन हम को मुहब्बत हो गई
हम समझते थे जिसे आफ़त तमाम
अब हमें उस की ही आदत हो गई
सुब्ह की पहली किरण के साथ में
देखने की उन को हसरत हो गई
अब चलो इतनी तो राहत हो गई
चूमने की अब इजाज़त हो गई
देखते ही देखते हम लुट गए
हम को भारी ये शराफ़त हो गई
जो इमारत ढह गई थी इश्क़ की
उस इमारत की मरम्मत हो गई
मय लगाकर होंठ से वो बोलते
अब हमारी तो इबादत हो गई
रात भर पलकें उठीं पलकें गिरीं
आँखों आँखों में शरारत हो गई
हम क़यामत पर न उन से मिल सके
हाए ये कैसी क़यामत हो गई
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