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तेरी बातें ग़ज़ल में हम पिरोएंगे
मिले फ़ुर्सत लिपट ख़ुद से ही रोएंगे
मिले फ़ुर्सत लिपट ख़ुद से ही रोएंगे
सुना कर लोरियाँ सब को सुलाता है
अजल की गोद में हम-तुम भी सोएंगे
समुंदर आँख में जिस के हो सिमटा
उसे बारिश ग़मों के क्या भिगोएंगे
बिछड़ना इश्क़ में मरने ही जैसा है
समझ आएगी जब अपने को खोएंगे
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लिखना जो हुआ ख़ुद को इक दिया लिखूँगा मैं
दिलरुबा को अपने बहती हवा लिखूँगा मैं
दिलरुबा को अपने बहती हवा लिखूँगा मैं
बे-चैन हो ख़त पढ़ के उस को नींद ना आए
नाम अपना कोने में सर-फिरा लिखूँगा मैं
इश्क़ की ग़ज़ल मेरी हो गई मुकम्मल तो
ख़ुद रदीफ़ बन तुम को क़ाफ़िया लिखूँगा मैं
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यक़ीं है कि हर कोई इज़्ज़त करेगा
मगर क्या मुझी सा मुहब्बत करेगा
मगर क्या मुझी सा मुहब्बत करेगा
चलेगा नहीं ज़ोर हम पे किसी का
बताए वो कैसे हुकूमत करेगा
पता था मुझे बा'द रुख़सत के मेरे
मुझे फिर से पाने कि मिन्नत करेगा
कहेंगे वही जो है दिल में हमारे
हुआ क्या अगर हम से नफ़रत करेगा
करूँं गौ़र क्यूँ उस कि ग़लती पे मैं भी
अभी है वो बच्चा शरारत करेगा
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