Shubham Seth

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    आग उगलती रातों में इक शीतलता सी छायी थी
    गर्मी की छुट्टी में फिर वो मामा के घर आयी थी

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    पानी में मैं डूब रहा हूँ देख मुझे
    दरिया से ख़ुद दूर किनारा जायेगा

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    मैनें तेरा नाम लिखा है शजरों पर
    उनका हर इक फूल निहारा जायेगा

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    तितली वो ही फूल चुनेगी जिस पर उसका दिल आये
    इक लड़की के पीछे इतनी मारामारी ठीक नहीं

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    अच्छा तुम भी उसके पीछे पागल हो
    इसका मतलब तुम भी पूरे पागल हो

    काजल बिंदी इन पर अब भी लिखते हो
    अब भी इनके पीछे इतने पागल हो

    खुद को पागल तो कोई भी कह लेगा
    साबित कैसे कर पाओगे पागल हो

    तुमने हक़ माँगा न ही कोई जंग लड़ी
    तुम ही बोलो कैसे मानें पागल हो

    मुझ जैसे पागल से प्यार हुआ तुमको
    फिर तो तुम भी अच्छे-खासे पागल हो

    तुमने भी उस पागल पर पत्थर फेंके
    तू भी काश किसी के पीछे पागल हो

    पागल की सब किस्में देख-परख लेना
    कोई नहीं जो ज्यादा मुझसे पागल हो

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    सड़क सूनी बहुत है और उस पर हम अकेले
    नहीं हैं गम भले चलना पड़ा हर दम अकेले

    कभी बारिश, कभी आंधी, कभी फिर धूप सर पे
    निकल जायेंगे तुम बिन अब सभी मौसम अकेले

    तुझे तो सामने से खुश लगेगा वो परिंदा
    मनाता है मगर वो कैद का मातम अकेले

    अकेलापन हमें खा जायेगा मालूम तो था
    तुझे देखे बिना फिर भी मरेंगे कम अकेले

    नमक सस्ता बहुत है उससे ज्यादा लोग सस्ते
    लगाता हूँ मैं अक्सर घाव पर मरहम अकेले

    गलतफहमी हुई होगी तुझे ये सच नहीं है
    तुझे किसने कहा मुझको बहुत हैं गम अकेले

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    सभी को लग रहा था खुदकुशी से मर गया था मैं
    मगर सच्चाई ये थी, खुद खुशी से मर गया था मैं

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    अकेलापन हमें खा जायेगा मालूम तो था
    तुझे देखे बिना फिर भी मरेंगे कम अकेले

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    जमाना भूल पायेगा नहीं अपनी मुहब्बत
    छपेंगे क्लास दसवीं में सभी किस्से हमारे

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    कहे ये दिल सुबह पढ़ के वही अखबार की बातें
    कहाँ तक अब सुने ये रोज़ की बेकार की बातें

    बड़े दिन बाद आया पर वही घर-बार की बातें
    चलो दो कश लगायें भूल कर संसार की बातें

    शिकारी बन गया सरदार जब अपने ही जंगल का
    भला जंगल सुने क्यों ऐसे अब गद्दार की बातें

    बिलख कर उन दरख़्तों ने हमें ये बद्दुआएं दीं
    मरोगे और होंगीं साँस के व्यापार की बातें

    मिला बरसों पुराना यार थोड़ी हिचकिचाहट थी
    हमें सूझा नहीं कुछ और बस दो चार की बातें

    हमें अच्छे दिनों की आश थी आये नहीं वो दिन
    महज़ बातें रहीं आखिर वही सरकार की बातें

    अरे छोड़ो हटाओ अब मुहब्बत कौन करता है
    बड़े हम ढीठ थे करते रहे सो प्यार की बातें

    लुभाते थे उसे बस आज के शायर सो मैंने भी
    पढ़ीं तहजीब की ग़ज़लें करीं अफ़्कार की बातें

    भुगतना ही पड़ा हर बार ही अंजाम गलती का
    नहीं मानी गयी जब भी तजुर्बेकार की बातें

    समझ में ही नहीं आया मुझे वो आदमी अब तक
    कभी अश्जार की बातें कभी नज्जार की बातें

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