ज़िंदगी हम को भारी लगती है
हर किसी से ये हारी लगती है
जी लिए हम जहाँ में अपने पल
मौत से अब तो यारी लगती है
ज़िंदगी महफ़िलों में गुज़री पर
तन्हा हम ने गुज़ारी लगती है
चोट पर चोट दे गई वो तो
वो हमें फिर भी प्यारी लगती है
लाख कोशिश पे जो न उतरे वो
ये अजब सी ख़ुमारी लगती है
ख़त्म कर दी जो लिखके काग़ज़ पे
वो कहानी तो जारी लगती है
साफ-गोई से उस ने ठुकराया
हम को फिर क्यूँ हमारी लगती है
— Amit Gautam















