पाई पाई को कमाने में पसीना आ गया

ज़िंदगी की दोपहर में मुझ को जीना आ गया

ऐश में ही कट रही थी यूँ तो अपनी ज़िंदगी
पर भँवर में याद काशी और मदीना आ गया

कश्मकश के जब समुंदर में लगे हम डूबने
एक उम्मीदों भरा देखो सफ़ीना आ गया

बे-वफ़ाई का हुआ जब ज़िक्र अहल-ए-बज़्म में
आप के माथे पे काहे को पसीना आ गया

जब लगा मंज़िल हमारे है बहुत नज़दीक सी
तब अचानक सामने फिर एक ज़ीना आ गया

— Amit Gautam

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