घर से दफ़्तर और फिर दफ़्तर से घर काफ़ी है क्या
ज़िन्दगी तू ही बता इतना सफ़र काफ़ी है क्या
ज़िन्दगी तू ही बता इतना सफ़र काफ़ी है क्या
कौन समझेगा मेरी तन्हाइयों के मसअले
है ज़माना यूँ तो मेरे साथ पर काफ़ी है क्या
आजकल मेरे त'आक़ुब में हैं आँखें यार की
इब्तिदाई इश्क़ में इतना असर काफ़ी है क्या
जल के मरना चाहिए था गर्मी-ए-इख़लास में
हैफ़ दीवाना हुआ ख़स्ता-जिगर काफ़ी है क्या
हुस्न तुझ में और थोड़ी दिल-कशी दरकार है
आतिशी-अबरू क़यामत-सी नज़र काफ़ी है क्या
इश्क़ मेरे और तुझ को क्या वज़ीफ़ा चाहिए
देख आख़िर हो गया मैं दर-ब-दर काफ़ी है क्या
फिर अनासिर ने बदल ली सूरत-ए-तरतीब और
आलम-ए-हस्ती हुआ ज़ेर-ओ-ज़बर काफ़ी है क्या
बे-दिली से आए थे हम भी कभी सहराओं में
दिल तो याँ लगने लगा अपना मगर काफ़ी है क्या
हाँ कभी झुकता न था ख़ल्क़-ए-ख़ुदा के सामने
तेरे सजदों में झुका जाता है सर काफ़ी है क्या
क्या करूँ ऐसा कि अपने दिल में वो रख ले मुझे
ऐ करन ये शेर-गोई का हुनर काफ़ी है क्या
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अपनों के हाथों में खंज़र देखें हैं
बिस्मिल अरमानों के लश्कर देखे हैं
बिस्मिल अरमानों के लश्कर देखे हैं
तुम ने इन आँखों का पानी देखा है
इन आँखों ने रोज़ बवंडर देखे हैं
गुलशन-गुलशन चीख़ सुनाई देती है
ख़ून से लथपथ चिड़ियों के पर देखे हैं
सहरा-सहरा ख़ाक उड़ाती उम्मीदें
गर्द-आलूद हज़ारों मंज़र देखे हैं
सुन ऐ इश्क़ औक़ात में रह तेरे जैसे
हम ने जाने कितने ख़ुद-सर देखे हैं
मेरे जैसा एक नहीं पाओगे तुम
यूँ तो तुम ने ख़ूब क़लन्दर देखे हैं
दोस्त लतीफ़ा-गोई है जिन का पेशा
हम ने ऐसे लोग भी जर्जर देखे हैं
इश्क़ की एवज़ पाए हैं ये ज़ख़्म मियाँ
तू ने ऐसे ज़ख़्म रफ़ू-गर देखे हैं
दर्द उठा कर भी सालिम हैं देख करन
हम ने कुछ ऐसे भी पत्थर देखे हैं
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टूटने की ज़द में, 'रिश्ता चल रहा है
आज-कल दोनों में, 'झगड़ा चल रहा है
आज-कल दोनों में, 'झगड़ा चल रहा है
रात भर आँसू, नहीं थमते हमारे
चल रहा है ख़ैर! जैसा चल रहा है
इश्क़, पहले था कभी, नामे-ख़ुदा पर
अब दिखावा है, दिखावा चल रहा है
हिर्स, मक्कारी, फ़रेब और नफ़रतों का
जिस तरफ़ देखो, तमाशा चल रहा है
थक चुका, पर मंज़िलों के ज़ौक़ में ही
ये मुसाफ़िर, आबला-पा चल रहा है
रात लहरा कर चली है, 'दश्त में अब
ख़्वाब, आँखों में, 'सुहाना चल रहा है
इश्क़ की शतरंज का है, वो 'पियादा
चाल सीधी, हो के टेढ़ा चल रहा है
सोचता हूँ, मैं भी उस के साथ हो लूँ
क़ैस सहरा में, अकेला चल रहा है
ऐ 'ख़ुदा! दुनिया तेरी, कितनी हसीं थी
देख अब दुनिया में, क्या क्या चल रहा है
हैं मुनाफ़े में, 'सियासत की दुकानें
झूठ के दम पर, ये धन्धा चल रहा है
ख़ाक हैं, सच्ची वफ़ा वाले जहाँ में
बस अदाकारों का, सिक्का चल रहा है
पूछते हो क्या, हमारा हाल दिलबर
इश्क़ में जैसा है, अच्छा चल रहा है
ख़ूब मुश्किल है, यूँ चलना रस्सियों पर
बाज़ी-गर तेरा, 'भरोसा चल रहा है
उस ने ही तौफ़ीक़ दी, तो मुतहर्रिक हैं
वो चलाता है, खिलौना चल रहा है
ऐ करन! अब ऐसे, दुनिया चल रही है
अंधे के पीछे जूँ, अंधा चल रहा है
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दर्द का आलम सुनहरा, भेज दे
काश माज़ी, लुत्फ़-ए-ईज़ा भेज दे
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