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लब पे आता था जो दुआ बन कर
दिल में रहता है अब ख़ला बन कर
दिल में रहता है अब ख़ला बन कर
कितना इतरा रहा है अब वो फूल
तेरे बालों का मोगरा बन कर
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हाल-ए-दिल क्यूँ न तुझे आज सुनाएँ ये बता
क्यूँ भला इश्क़ के जज़्बे को दबाएँ ये बता
क्यूँ भला इश्क़ के जज़्बे को दबाएँ ये बता
हम तो इस जुर्म-ए-मोहब्बत में जले जाते हैं
इस की अब हम को तू क्या देगा सज़ाएँ ये बता
सब तो ज़ाहिर हुए जाता है मेरे चेहरे से
राज़-ए-उल्फ़त को भला कैसे छुपाएँ ये बता
दिल की बस्ती को तेरे आने पे रौशन कर दें
या तेरे जाने पे हम इस को जलाएँ ये बता
तेरे पैरों में झनकती हुई पायल बांधे
या तेरे माथे पे इक बोसा सजाएँ ये बता
तेरी आँखों के समुंदर में कहीं डूब चलें
या तेरे क़दमों पे तारों को बिछाएँ ये बता
तुझ से आँखों को मिलाते हुए इज़हार करें
या कि इज़हार में नज़रों को झुकाएँ ये बता
हम किसी और सफ़र का कहीं आगाज़ करें
या तेरे साथ ही अब शहर बसाएँ ये बता
हम को घाइल किया लहजे ने कभी नज़रों ने
ये अदाएँ हैं तेरी या हैं जफ़ाएँ ये बता
कुछ उसूलों पे टिका होता है रिश्तों का शजर
अब यही चीज़ तुझे कैसे सिखाएँ ये बता
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नए सपने सजाने में ज़माने बीत जाते हैं
किसी मंज़िल को पाने में ज़माने बीत जाते हैं
किसी मंज़िल को पाने में ज़माने बीत जाते हैं
जिसे दिल में बसाने में ज़रा सा वक़्त लगता है
उसे दिल से भुलाने में ज़माने बीत जाते हैं
ये दिल मजबूर होता है तो पत्थर बन ही जाता है
इसे फिर दिल बनाने में ज़माने बीत जाते है
कोई जब रूठ जाए तो उसे झट से मना लोगे
मगर ख़ुद को मनाने में ज़माने बीत जाते हैं
भरोसे का जो टूटा सा महल ले कर बिछड़ता है
उसे वापस बुलाने में ज़माने बीत जाते हैं
कोई वा'दा जो करना हो तो फिर इक पल नहीं लगता
मगर वादे निभाने में ज़माने बीत जाते हैं
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