KARAN
KARAN
Ghazal

जहालतों का वो मातम मना के लौट गए

ज़हीन लोग थे चेहरा छुपा के लौट गए

न रास आई उन्हें रौनकें ज़माने की
चराग़े-दहर वो सारे बुझा के लौट गए

अजीब किस्म के ताजिर थे वो मेरे भाई
बिका न कुछ तो दुकानें बढ़ा के लौट गए

सियासतों का ये धंधा कमाल है साहिब
तरह तरह के भरोसे दिला के लौट गए

रक़ाबतों के ये कैसे उसूल थे वो भी
जो बुझ सके न तो हम को जला के लौट गए

न सिरफ़िरा कोई पाओगे आप हम जैसा
फ़राज़ो-रुतबा-ओ-शोहरत लुटा के लौट गए

करन ये बात तो सच है कि तू दीवाना है
मगर वो लोग जो दामन बचा के लौट गए

— KARAN

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