ख़ुद से ये बला टलती ही कहाँ मिरे सर से
होता है नहीं तर्क-ए-इश्क़ बोलने भर से
होता है नहीं तर्क-ए-इश्क़ बोलने भर से
जो दिलासे के ख़ातिर ही जगह जगह बिखरा
दिल वो क्यूँ ही चाहेगा कोई फिर घटा बरसे
देख ये ख़लल फिर डालेगी मेरी ख़ल्वत में
आ रही हवा ये जो तेरे जिस्म के दर से
इस से पहले राएगाँ था हर एक घर में जो
फूल हो गया बाहर आके आप के घर से
आइना दिखाने पर हाल हो गया ऐसा
कोई कुछ नहीं कहता सच को कहने के डर से
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बारहा ये हकलाहट थोड़ा ध्यान से सुन लो
हो सके तो दिल तुम से कुछ भी कह नहीं पाए
हो सके तो दिल तुम से कुछ भी कह नहीं पाए
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