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बेहोश था पहाड़ में
जब घर मिला पहाड़ में
जब घर मिला पहाड़ में
तू सर झुका पहाड़ में
है देवता पहाड़ में
दो दिन रहा मैं गाँव में
पर खो गया पहाड़ में
सोने समय ख़ुदा ने फिर
इक सर रखा पहाड़ में
बचपन छुपा था पीठ में
जब दी सदा पहाड़ में
आँखें मिलाई उस ने जब
मंदिर दिखा पहाड़ में
मानो तिरा बदन कोई
हो रास्ता पहाड़ में
वो मेरे दिल में इतना है
जितनी हवा पहाड़ में
उस का शबाब देख के
ग़ुंचा खिला पहाड़ में
सब इश्क़ इश्क़ कह रहे
मैं कह रहा पहाड़ में
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प्यार का बस इक इशारा ही मिले
डूब जाऊँगा अगर मछली मिले
डूब जाऊँगा अगर मछली मिले
उम्र क़ैदी इश्क़ का हूँ पर मुझे
उस की बाँहों से अभी फाँसी मिले
भाग जाता दूर कब का इश्क़ से
गर कफ़स में एक भी खिड़की मिले
शाम आँखें हो थकी और वो दिखे
मुफ़्लिसी हो रोटियों पर घी मिले
खोल दूँ सारा बदन उस का अगर
इस तिजोरी की मुझे चाबी मिले
हाथ रख दिल पर भले छू मत कहीं
काम पर रख सैलरी कुछ भी मिले
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आज तुम ने किस को ये बोसा किया है
कुछ किया है तो कहाँ ख़र्चा किया है
कुछ किया है तो कहाँ ख़र्चा किया है
देखता तू क्यूँ नहीं इक सम्त मेरी
क्या तुझे भी प्यार ने अंधा किया है
दिल को भी उम्मीद थी उस से कि जिस ने
काम भी दफ़्तर में इक हफ़्ता किया है
ढूँढ़ता जब भी में ख़ुद को दिल गली में
बे-वफ़ा ने पीठ में धप्पा किया है
देख कर सूरत बुरी देखी न सीरत
शीशे ने भी हर्फ़ को उल्टा किया है
छोड़ देंगे ख़्वाब तेरा कल से अब हम
रात ठहरो रात से वा'दा किया है
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