अगर मर ही न पाए तुम मुहब्बत में
तो फिर मर क्यूँ नहीं जाते नदामत में
मैं उसके नाम से चिढ़ने लगा हूँ अब
दुखा है दिल मुहब्बत की अदालत में
हमेशा टाल देते हो यही कह कर
कभी तो हम करेंगे बात फ़ुर्सत में
ख़ुदा के सामने सर फोड़ता हूँ मैं
असर अब है नहीं मेरी इबादत में
लुटेरे भी हवा में उड़ रहे हैं अब
नशा काफ़ी गज़ब का है सियासत में
यकायक मरना है तो ख़ुद-कुशी कर लो
अगर क़िस्तों में तो फिर दिल्लगी कर लो
नहीं मरना है ज़िंदा भी नहीं रहना
मिरी मानो तो तुम फिर मयकशी कर लो
मैं शहर से तेरे निकल कर अपनी बस्ती जाउँगा
मैं जाउँगा मौजूदगी में तेरी जल्दी जाउँगा
मैं जो तुम्हारी हर अज़िय्यत सह के अब तक ज़िंदा हूँ
जिस दिन गले से तुम लगाओगी मैं मर ही जाउँगा
ख़ुश रहे ता-उम्र तू अपनी निशात-ए-ज़िंदगी में
तेरे पथ ने ओढ़ी है झड़ते हुए फूलों की चादर