अगर मर ही न पाए तुम मुहब्बत में
तो फिर मर क्यूँ नहीं जाते नदामत में
तो फिर मर क्यूँ नहीं जाते नदामत में
मैं उस के नाम से चिढ़ने लगा हूँ अब
दुखा है दिल मुहब्बत की अदालत में
हमेशा टाल देते हो यही कह कर
कभी तो हम करेंगे बात फ़ुर्सत में
ख़ुदा के सामने सर फोड़ता हूँ मैं
असर अब है नहीं मेरी इबादत में
लुटेरे भी हवा में उड़ रहे हैं अब
नशा काफ़ी ग़ज़ब का है सियासत में
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जानता हूँ कि बर्बाद हूँ मैं सो अब
तू मिरा ग़म मना ले नसीहत न दे
तू मिरा ग़म मना ले नसीहत न दे
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