सबने कितनी लज़्ज़त से देखा मुझ को
रोज़-ए-मर्ग तबीअत से देखा मुझ को
आने वालों को सानेहा मज़ाक़ लगा
जाने वालों ने फ़ुर्सत से देखा मुझ को
इतना ज़्यादा गहरा था ये नशेब-ए-दिल
उतरने वालों ने छत से देखा मुझ को
अपनी प्यास बचा लाया हूँ इतनी दूर
दरिया दरिया ने हैरत से देखा मुझ को
उस घर में चारों ओर बेटियाँ थी बस
सबने शिद्दत-ओ-हसरत से देखा मुझ को
— komal selacoti















