"रोना ज़ब्त है"
मैं पूछता हूँ ख़ुदा से
वो ख़ुदा जो सबका है
मेरा नईं
ये अलग बात है जानाँ
तुम भी ख़ुदा ही थीं मुझे
इस लिए शायद अब मेरा
कोई भी तो ख़ुदा नईं
फिर भी पूछता हूँ
क्या ये लोग
कभी नहीं रोयेंगे?
किसी रोज़
इन के चश्में-तर नहीं होंगे?
मैं पूछूँगा उस रोज़ जब इनका
अपना इनसे छिन जाएगा
रोते क्यूँ हो रोना ज़ब्त है
— Navneet Vatsal Sahil















