एक क़िस्सा वफ़ा का सुना दीजिए
दर्दे दिल को ज़रा अब बढ़ा दीजिए
मेरे अल्ला कब तक शब-ए-हिज्र ये
मुझको महबूब से फिर मिला दीजिए
ज़ख़्मों पे ज़ख़्म खाए ज़माने गुज़र गए
पत्थर भी घर में आए ज़माने गुज़र गए
मेरी निगाह अब भी उसी सिम्त है मगर
खिड़की पे उसको आए ज़माने गुज़र गए
इश्क़ में धोखा खाने वाले
हम है दर्द छुपाने वाले
तुमको इक दिन आना होगा
रूठ के मुझसे जाने वाले
इन हवाओं में ज़रा सी खुशबू हज़रत घोलिये
थोड़ी हिंदी थोड़ी सी उर्दू यहाँ पर बोलिये
दोस्ती की है अगर तू ने निभाऊँगा जरूर
कर्ज़ अपना मैं मेरे यार चुकाऊँगा ज़रूर
जब तेरे सामने जाने की कभी सोचूँगा
इन निगाहों में नया ख़्वाब सजाऊँगा ज़रूर
वक़्त पे काम अब कोई आता नहीं
साथ गर्दिश में अपना निभाता नहीं
हाथ यूं तो मिलाते है अक्सर यहाँ
दिल से दिल आज कोई मिलाता नहीं