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चमन वालों से बर्क़-ए-बे-अमाँ कुछ और कहती है
मगर मेरी तो शाख़-ए-आशियाँ कुछ और कहती है
मगर मेरी तो शाख़-ए-आशियाँ कुछ और कहती है
नज़र में उस की यूँ तो सब की ही रफ़्तार है लेकिन
मिरे क़दमों से गर्द-ए-कारवाँ कुछ और कहती है
यहाँ का ज़र्रा ज़र्रा महशर-ए-ग़म है हक़ीक़त में
ब-ज़ाहिर रौनक़-ए-बज़्म-ए-जहाँ कुछ और कहती है
है उन की ही नज़र आईना-ए-दैर-ओ-हरम लेकिन
यहाँ कुछ और कहती है वहाँ कुछ और कहती है
किसी दिन साथ छुट जाने का ख़तरा है उसे शायद
तिरे ग़म से मेरी उम्र-ए-रवाँ कुछ और कहती है
यही तुम को यक़ीं क्यूँ है कि कोई इल्तिजा होगी
सुनो तो मेरी चश्म-ए-ख़ूँ-फिशाँ कुछ और कहती है
मुझे अपनी सदाक़त पर भी शक है इस ज़माने में
कि दिल कुछ और कहता है ज़बाँ कुछ और कहती है
जहाँ में गो नहीं आसार कुछ ऐसे क़यामत के
मगर गुमराही-ए-अहल-ए-जहाँ कुछ और कहती है
कभी 'कैफ़' इस का लोहा मानते थे लखनऊ वाले
मगर अब अहल-ए-देहली की ज़बाँ कुछ और कहती है
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अब सोचता हूँ जाऊँ तो जाऊँ किधर को मैं
ऐ काश छोड़ता न तिरी रहगुज़र को मैं
ऐ काश छोड़ता न तिरी रहगुज़र को मैं
दिल ग़म का आइना है नज़र दिल का आइना
कैसे छुपाऊँ सोज़-ए-निहाँ के असर को मैं
आलम तमाम एक फ़रेब-ए-निगाह है
अब क्या दिखाऊँ चश्म-ए-हक़ीक़त-निगर को मैं
मदहोशियों में टूट गया दिल का आइना
अब कैसे मुँह दिखाऊँगा आईना-गर को मैं
उन की नज़र ख़ुदा न करे मुन्फ़इल हो 'कैफ़'
देखूँ न काश जज़्बा-ए-ग़म के असर को मैं
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वो क़रीब भी हैं तो क्या हुआ हमें अपने काम से काम है
वही जुस्तुजू वही बे-ख़ुदी वही ज़िंदगी का निज़ाम है
वही जुस्तुजू वही बे-ख़ुदी वही ज़िंदगी का निज़ाम है
तलब इर्तिक़ा की असास है कि ग़म-ए-असीरी का नाम है
कि जहाँ चमन है वहीं क़फ़स जहाँ दाना है वहीं दाम है
हमा-वक़्त मुझ को यही है ग़म कि उन्हें है मेरा ख़याल कम
मगर इस की फ़िक्र कभी नहीं कि मिरा जुनूँ भी तो ख़ाम है
मुझे मय-कदे में किसी ने कल ये बताया मस्लक-ए-आशिक़ी
जिसे बादा वज्ह-ए-सुरूर हो उसे बादा पीना हराम है
ये है शान-ए-महफ़िल-ए-आशिक़ी कि तवील अर्सा गुज़र के भी
वही बुत-कदे की सी सुब्ह है वही मय-कदे की सी शाम है
ये है कैसा आलम-ए-बे-ख़ुदी नहीं होश उन की रज़ा का भी
जो यही है 'कैफ़' जुनून-ए-ग़म तो जुनून-ए-ग़म को सलाम है
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सब जिसे कहते हैं वक़्फ़-ए-ग़म-ए-जानाँ होना
अव्वलीं शर्त है उस के लिए इंसाँ होना
अव्वलीं शर्त है उस के लिए इंसाँ होना
ग़म के दाग़ों ने बड़ा काम बनाया दिल का
इस सियह-ख़ाने में मुश्किल था चराग़ाँ होना
अपने परतव के सिवा ज़ेहन में कुछ भी न रहा
और सिखलाइए आईनों को हैराँ होना
उफ़ ये दीवानगी-ए-इश्क़ कि इस बज़्म में भी
जब कभी होश में आना तो परेशाँ होना
बज़्म-ए-आलम हो कि महशर मेरी दानिस्त में है
इक तजल्ली का कई रुख़ से नुमायाँ होना
ख़ार-ओ-ख़स को भी निगाहों में रखें अहल-ए-चमन
वर्ना मुमकिन नहीं तंज़ीम-ए-बहाराँ होना
दिल के टुकड़े सर-ए-दामन पे लिए बैठा हूँ
खेल समझा था इलाज-ए-ग़म-ए-पिन्हाँ होना
मेरा किरदार है ज़ाहिर मिरे अश'आर से 'कैफ़'
जैसे तस्वीर में इक रंग नुमायाँ होना
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क्या दिलकशी है अंजुम-ओ-ख़ुर्शीद-ओ-माह में
ऐसे न जाने कितने हैं इस जल्वा-गाह में
ऐसे न जाने कितने हैं इस जल्वा-गाह में
जन्नत ख़याल में है न दुनिया निगाह में
क्या लज़्ज़तें मिली हैं ग़म-ए-बे-पनाह में
दिल को रहे शुऊ'र जो हाल-ए-तबाह में
मेराज-ए-ज़िंदगी है ग़म-ए-बे-पनाह में
क्या जाने क्या असर था किसी की निगाह में
सौ हुस्न आ गए मिरे हाल-ए-तबाह में
मुझ से निगाह फेर के क्यूँ जा रहे हो तुम
मेरी तो ज़िंदगी है तुम्हारी निगाह में
मेआ'र-ए-बंदगी-ए-बशर ही बदल दिया
कुछ रिंद आ गए थे किसी ख़ानक़ाह में
रहमत को भी मुआविन-ए-ग़फ़लत बना दिया
यूँ भी कोई न आए फ़रेब-ए-गुनाह में
ईमान और कुफ़्र का झगड़ा ही खो दिया
वो जब कभी समाए किसी की निगाह में
तेरी नज़र की ख़ैर हो कितने ही आइने
टूटे हुए पड़े हैं मोहब्बत की राह में
हम दोनों महव-ए-शौक़ में लेकिन मआल-ए-शौक़
उन की निगाह में है न मेरी निगाह में
ऐसे अदब से देख रहे हैं वो आइना
हाज़िर हो जैसे कोई किसी बारगाह में
पैग़म्बरी रज़ा-ए-इलाही है वर्ना 'कैफ़'
याक़ूब देख सकते थे यूसुफ़ को चाह में
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वो ग़म दे रहे हैं ख़ुशी हो रही है
हक़ीक़त में अब आशिक़ी हो रही है
हक़ीक़त में अब आशिक़ी हो रही है
अभी मोहतसिब मय-कदे में न आएँ
ठहर जाइए मय-कशी हो रही है
मोहब्बत में कितने ही मंसूर गुम हैं
ख़ुदी भी यहाँ बे-ख़ुदी हो रही है
न ज़ौक़-ए-तलब है न एहसास-ए-मंज़िल
ये जीना है या ख़ुद-कुशी हो रही है
कोई जुरअतें देखे अहल-ए-हवस की
मोहब्बत से भी दिल लगी हो रही है
ये मय-ख़ाने में किस का पैमाना छलका
बहुत दूर तक रौशनी हो रही है
न पूछो यगानों की बेगानगी को
ये सब दोस्त में दोस्ती हो रही है
अजब आलम-ए-'कैफ़' है बज़्म-ए-जानाँ
निगाहों से भी बंदगी हो रही है
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बढ़े चलो कि ज़माने को ये दिखाना है
जहाँ हमारे क़दम हैं वहीं ज़माना है
जहाँ हमारे क़दम हैं वहीं ज़माना है
ये हुस्न-ओ-इश्क़ की तफ़रीक़ इक बहाना है
कहीं नज़र को कहीं दिल को आज़माना है
अब इस जुनून-ए-तलब का कोई ठिकाना है
कि अपने आप को खो कर भी उन को पाना है
बस एक इश्क़ ही ऐसा शराब-ख़ाना है
जहाँ सुरूर का मफ़्हूम होश आना है
इलाही तमकनत-ए-हुस्न-ओ-नाज़-ए-हुस्न की ख़ैर
कुछ आज इश्क़ का अंदाज़ वालिहाना है
मैं हर गुनाह की हक़ीक़त बता तो दूँ सर-ए-हश्र
मगर उन्हें जो हर इल्ज़ाम से बचाना है
ज़रा जुनून-ए-तमन्ना से दिल गुज़र जाए
फिर इस के बा'द कोई दाम है न दाना है
मैं जानता हूँ जो है फ़र्क़-ए-ज़ात-ओ-परतव-ए-ज़ात
मिरी निगाह पस-ए-पर्दा-ए-ज़माना है
किसे नसीब हो सज्दा ये और बात है 'कैफ़'
हर इक जबीं के क़रीब उन का आस्ताना है
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