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दीप अंधों के दरमियाँ होगा
तो उजाले का इम्तिहाँ होगा
तो उजाले का इम्तिहाँ होगा
दिल के अंदर भी चार ख़ाने हैं
कोई कैसे न बद-गुमाँ होगा
जिस के पैरों तले ज़मीं होगी
उस के क़दमों में आसमाँ होगा
इक हक़ीक़त से आश्ना हूँ मैं
सब का दुनिया में इम्तिहाँ होगा
जाओगे तुम जहाँ जहाँ 'अहया'
इक दिवाना वहाँ वहाँ होगा
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कितना कमज़ोर है ईमान पता लगता है
घर में आया हुआ मेहमान बुरा लगता है
घर में आया हुआ मेहमान बुरा लगता है
मैं ने होंटों पे तबस्सुम तो सजा रक्खा है
ग़म भुलाने में मगर वक़्त बड़ा लगता है
आप बेकार मुझे शजरा दुखाने आए
आप जो भी हैं वो लहजे से पता लगता है
जब मिलाता हूँ नज़र तो नहीं मिलती नज़रें
जब हटाता हूँ नज़र उस को बुरा लगता है
तितलियाँ बन गईं फिर आज वफ़ादार कई
बाग़ में कोई नया फूल खिला लगता है
यूँ ग़म-ए-हिज्र को दुनिया से छुपाता हूँ मगर
कितना कमज़ोर हूँ आँखों से पता लगता है
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ऐ काश हो बरसात ज़रा और ज़रा और
बढ़ जाए मुलाक़ात ज़रा और ज़रा और
बढ़ जाए मुलाक़ात ज़रा और ज़रा और
हाथों में तिरा हाथ ये काफ़ी तो नहीं है
मिल जाएँ ख़यालात ज़रा और ज़रा और
खलती है ये तन्हाई तो दूरी भी मिटा दे
तू मान मिरी बात ज़रा और ज़रा और
बुझती है कहाँ प्यास अब आँखों से पिला कर
दे प्यार की सौग़ात ज़रा और ज़रा और
हालात हूँ हमवार तो क्या फ़िक्र है लेकिन
मुश्किल में मुनाजात ज़रा और ज़रा और
जब प्यार से मिलता है तो भरता है कहाँ दिल
उल्फ़त से भरी रात ज़रा और ज़रा और
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