कैसे कभी किसी को दिखाएगा आईना
जब एक दूसरे को लड़ाएगा आईना
जिस रौशनी पे अक्स का दार-ओ-मदार है
उस रौशनी को कौन दिखाएगा आईना
फ़ितरत में उस की नाज़-ख़िरामी नहीं तो फिर
क्यूँकर किसी के नाज़ उठाएगा आईना
समझो कि आईने का जनाज़ा निकल गया
जिस दिन अमीर-ए-शहर को भाएगा आईना
ऐसा नहीं कि सिर्फ़ सँवारेगा शख़्सियत
एहसान भी न तुम पे जताएगा आईना
पर्दा पड़ा हो आँखों पे मुमकिन तो है मगर
मुमकिन नहीं कि ऐब छुपाएगा आईना
कह दो अना-परस्त से 'अहया' कि जल्द ही
मैं और हम के दरमियाँ आएगा आईना
— Ehya Bhojpuri















