हुस्न पर जाँ-निसार करता हूँ
शम्अ'''-रूओं को प्यार करता हूँ
शम्अ'''-रूओं को प्यार करता हूँ
आप के इश्क़ ने जो बख़्शे हैं
उन ग़मों का शुमार करता हूँ
आह ईमाँ-परस्त हो कर भी
एक काफ़िर से प्यार करता हूँ
मुझ पे वो मश्क़-ए-नाज़ करते हैं
शुक्र-ए-पर्वरदिगार करता हूँ
दिल को हर दम फ़रेब देता हूँ
आप का इंतिज़ार करता हूँ
गो तिरा अहद अहद-ए-बातिल है
फिर भी मैं ए'तिबार करता हूँ
गुल-रुख़ों की अदा अदा पे 'नरेश'
मैं दिल-ओ-जाँ निसार करता हूँ
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अपने मन में झाँक कर भी ख़ुद से बेगाना रहा
तू हक़ीक़त आश्ना हो कर भी दीवाना रहा
तू हक़ीक़त आश्ना हो कर भी दीवाना रहा
रुख़ अगरचे जानिब-ए-का'बा रहा है शैख़ का
दिल मगर याद-ए-बुताँ से इक परी-ख़ाना रहा
संग-ए-असवद को दिया बोसा तो दिल कहने लगा
का'बा-ओ-क़िबला से कितनी दूर बुत-ख़ाना रहा
एक दिन पी कर ज़रा सच कह दिया था उम्र भर
शक्ल से बेज़ार मेरी पीर-ए-मय-ख़ाना रहा
इश्क़ ने बख़्शी है वो शोहरत 'नरेश' इक उम्र तक
बच्चे बच्चे की ज़बाँ पर मेरा अफ़्साना रहा
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ज़िक्र-ए-माज़ी से शब-ओ-रोज़ सताते हैं मुझे
मेरे अहबाब ही दीवाना बनाते हैं मुझे
मेरे अहबाब ही दीवाना बनाते हैं मुझे
मैं तो इक जुमला-ए-बा-मा'नी-ओ-बा-मतलब हूँ
और वो हर्फ़-ए-ग़लत कह के मिटाते हैं मुझे
एक बे-रब्त तअल्लुक़ का सहारा ले कर
लोग क्या इश्क़ के अंदाज़ सिखाते हैं मुझे
जो थे अपने ही ख़द-ओ-ख़ाल से ग़ाफ़िल कल तक
आज वो लोग भी आईना दिखाते हैं मुझे
कुछ तबीअ'त ही बग़ावत की तरफ़ माइल है
वर्ना मयख़ाने के आदाब तो आते हैं मुझे
कुछ तअल्लुक़ कोई निस्बत नहीं लेकिन फिर भी
ऐ 'नरेश' आज सुना है कि बनाते हैं मुझे
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मैं कभी मकाँ से गुज़र गया कभी ला-मकाँ से गुज़र गया
तिरे शौक़ में तुझे क्या ख़बर मैं कहाँ कहाँ से गुज़र गया
तिरे शौक़ में तुझे क्या ख़बर मैं कहाँ कहाँ से गुज़र गया
हैं क़दम क़दम पे वहाँ वहाँ मिरी जुस्तुजू की कहानियाँ
तिरे संग-ए-दर की तलाश में मैं जहाँ जहाँ से गुज़र गया
मैं गुनाहगार-ए-वफ़ा हूँ वो जो तलाश-ए-यार के जोश में
जहाँ पेश आईं मुसीबतें ब-खु़शी वहाँ से गुज़र गया
कोई बे-ख़ुदी सी है बे-ख़ुदी मुझे ये भी होश नहीं रहा
तिरा दर्द दिल में लिए मैं कब तिरे आस्ताँ से गुज़र गया
मिरी राह-ए-फ़र्ज़ पे हम-नशीं कहीं हुस्न था कहीं इश्क़ था
मैं ब-फ़ज़्ल-ए-मालिक-ए-दो-जहाँ यूँही दरमियाँ से गुज़र गया
किसे ढूँढती है नज़र तिरी यहाँ कोई अहल-ए-गुनह नहीं
वही इक 'नरेश' था ऐ ख़ुदा जो तिरे जहाँ से गुज़र गया
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ज़ीस्त बे-आसरा न हो जाए
दर्द दिल से जुदा न हो जाए
दर्द दिल से जुदा न हो जाए
लुत्फ़ आता है रंज सहने में
मेरे ग़म की दवा न हो जाए
आ रही है बहार फूलों पर
जोश-ए-वहशत सिवा न हो जाए
कह तो दूँ हाल-ए-दिल उसे लेकिन
डर है ज़ालिम ख़फ़ा न हो जाए
ख़ौफ़ है मुझ से आँख लड़ते ही
उन की शोख़ी हया न हो जाए
वो गुरेज़ाँ से हैं सितम से 'नरेश'
ज़िंदगी बे-मज़ा न हो जाए
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वो जो महफ़िल में ख़ूब हँसता था
हाए वो शख़्स कितना तन्हा था
हाए वो शख़्स कितना तन्हा था
चुप का ये तजरबा भी कैसा था
सारा घर साएँ साएँ करता था
तुम से रूठा तो था ज़रूर मगर
ख़ुद से डर कर मैं घर से भागा था
जितने आँसू थे मेरे अपने थे
और हर क़हक़हा पराया था
हुस्न क्या ज़ेहन की ज़रूरत थी इश्क़ क्या जिस्म का तक़ाज़ा था
पक चुकी फ़स्ल काट अब इस को
खेत वहमों का तू ने बोया था
तुम ने जिस की दुआएँ माँगी थीं
अब्र वो पर्बतों पे बरसा था
मेरे अंदर का मैं विसाल की शब
मुझ से भी तेज़ तेज़ दौड़ा था
हाए वो दिन 'नरेश' जब उस ने
ख़त न लिखिए ये ख़त में लिक्खा था
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पुर्सिश-ए-ग़म को न आ ग़म का मुदावा हो जा
मुझ में दिल बन के धड़क मेरा सरापा हो जा
मुझ में दिल बन के धड़क मेरा सरापा हो जा
पावँ रखने को ज़मीं तग न मुयस्सर होगी
भीड़ से ऊँचा न उठ भीड़ का हिस्सा हो जा
अक़्ल कहती है कि माँग उन से वफ़ाओं का सिला
दिल ये कहता है कि महरूम-ए-तमन्ना हो जा
टूट ही जाएँ न धरती से कहीं सब रिश्ते
इतना ऊँचा भी न उड़ थोड़ा सा नीचा हो जा
रिफ़अतें छू के दिखा इश्क़-ओ-मोहब्बत की 'नरेश'
उस ने इक क़तरा जो माँगा है तो दरिया हो जा
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चोट खाई हो जिस ने उल्फ़त की
क्या करे बात वो मसर्रत की
क्या करे बात वो मसर्रत की
चार दिन हँस के उम्र भर रोना
दास्ताँ मुख़्तसर है उल्फ़त की
एक धोका है ख़ुद-फ़रेबी है
आरज़ू इस जहाँ में राहत की
आदमी आदमी का दुश्मन है
उफ़ ये तज़लील आदमियत की
शोख़ ऐसा बना दिया तुम को
ये भी सनअ'त है इक मशिय्यत की
काश मिट जाएँ कू-ए-जानाँ में
हम को ख़्वाहिश नहीं है जन्नत की
दिल जलाने पे भी न दूर हुई
तीरगी ऐ 'नरेश' फ़ुर्क़त की
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ग़म जुदाई का न शायद मुझे इतना होता
तुम ने ऐ काश जो मुझ को कभी समझा होता
तुम ने ऐ काश जो मुझ को कभी समझा होता
इब्न-ए-आदम न कभी इस तरह तिश्ना होता
रेत पे उस को जो पानी का न धोका होता
ऐन मुमकिन है कि ज़िद छोड़ के वो रुक जाता
जाने वाले ने जो मुड़ कर मुझे देखा होता
क्या अजब है कि वो गंदुम को न छूता हरगिज़
मर्द-ए-अव्वल न अगर बख़्त का मारा होता
दो क़दम साथ तो मिलते मिरे अहबाब 'नरेश'
काश हर दोस्त ने विश्वास न तोड़ा होता
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दिल सी नायाब चीज़ खो बैठे
कैसी दौलत से हाथ धो बैठे
कैसी दौलत से हाथ धो बैठे
अहद-ए-माज़ी का ज़िक्र क्या हमदम
अहद-ए-माज़ी को कब के रो बैठे
हम को अब ग़म नहीं जुदाई का
अश्क-ए-ग़म जाम में समो बैठे
वा'ज़ करने को आए थे वाइ'ज़
मय से दामन मगर भिगो बैठे
क्या सबब है 'नरेश'-जी आख़िर
क्यूँ जुदा आज सब से हो बैठे
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