अगर है इश्क़ सच्चा तो निगाहों से बयाँ होगा
ज़बाँ से बोलना भी क्या कोई इज़हार होता है
होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है
इश्क़ हो जाए किसी से कोई चारा तो नहीं
सिर्फ मुस्लिम का मोहम्मद पे इजारा तो नहीं
ऐ इश्क़-ए-जुनूँ-पेशा हाँ इश्क़-ए-जुनूँ-पेशा
आज एक सितमगर को हँस हँस के रुलाना है
तर्जुबा था सो दुआ की के नुकसान ना हो
इश्क मजदूर को मजदूरी के दौरान ना हो
मै उसे देख ना पाता था परेशानी मे
सो दुआ करता था मर जाये परेशान ना हो
ख़ुदा ने फ़न दिया हमको कि लड़के इश्क़ लिखेंगे
ख़ुदा कब जानता था हम, ग़ज़ल में दर्द भर देंगे
इश्क़ भी अपनी ही शर्तों पे किया है मैं ने
ख़ुद को बेचा नहीं बाज़ार में सस्ता करके
उस से कहना था के वो कितना ज़रूरी है मुझे
आ रहा हूँ अभी जिस शख़्स से झगड़ा करके
यार इसमें तो मज़ा है ही नहीं
कोई भी हमसे ख़फ़ा है ही नहीं
इश्क़ ही इश्क़ है महसूस करो
और कुछ इसके सिवा है ही नहीं
मेरा किरदार मेरी बात कहाँ सुनता है
ये समझदार मेरी बात कहाँ सुनता है
इश्क़ है वादा-फ़रामोश नहीं है कोई
दिल तलबगार मेरी बात कहाँ सुनता है