मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों खराब
मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई
ऐ शख़्स अब तो मुझ को सब कुछ क़ुबूल है
ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई
अगर है इश्क़ सच्चा तो निगाहों से बयाँ होगा
ज़बाँ से बोलना भी क्या कोई इज़हार होता है
अब जो कोई पूछे भी तो उस से क्या शरह-ए-हालात करें
दिल ठहरे तो दर्द सुनाएँ दर्द थमे तो बात करें
तन्हाई हो, हिज्र हो, बातें करने को तरसे ये दिल,
इश्क़ हुआ वो जिसमें ये हालात मुसलसल रहते हों
शबाब अब बस करो तुम भी, तुम अब क्या कर के मानोगे
ग़ज़ल के ज़रिए तुम भी यार क्या हालात कहते हो
आज फिर इज़हार करते हैं सनम
आपसे ही प्यार करते हैं सनम
आपको क्या इश्क़ से परहेज़ है
आप क्यों इनकार करते हैं सनम
ज़िस्त की जान जाते भी देखा हूंँ मैं
मौत को साँस आते भी देखा हूंँ मैं
सब तो हँसते ही हैं मेरे हालात पे
दर्द को मुस्कुराते भी देखा हूंँ मैं
बदले मौसम हालात यहाँ
है ख़ुशियों की बारात यहाँ
होली खेलेंगे हम भी पर
खेलेंगे तेरे साथ यहाँ
अपने इश्क़ का यूँ इज़हार करना है तुझसे
तुझको हाथों से पहनाएँगें कानों में झुमके
उसे अपना कहा बस आजमाइश ही नहीं माँगी
ख़ुदा माँगा तो पर उसकी नवाज़िश ही नहीं माँगी
महीने भर से प्यासा छटपटाता मर गया था मैं
वो बादल आए तो थे मैंने बारिश ही नहीं माँगी
कीजे इज़हार-ए-मोहब्बत चाहे जो अंजाम हो
ज़िंदगी में ज़िंदगी जैसा कोई तो काम हो
मुझ से नफ़रत है अगर उस को तो इज़हार करे
कब मैं कहता हूँ मुझे प्यार ही करता जाए