ये मजमा तुम को सुनना चाहता है

वगरना शोर किस का मसअला है

मुझे अब और कितना रोना होगा
तिरा कितना बक़ाया रह गया है

ख़ुशी महसूस करने वाली शय थी
परिंदों को उड़ा कर क्या मिला है

दरीचे बंद होते जा रहे हैं
तमाशा ठंडा पड़ता जा रहा है

तुम्हीं मज़मून बाँधो शा'इरी में
अपुन लहजा बनाना माँगता है

ये कासे जल्द भरने लग गए हैं
भिखारी बद्‌दुआ देने लगा है

तुम्हारी एक दिन की सोच है और
हमारा उम्र भर का तजरबा है

— Zia Mazkoor

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