इक ज़रा सा टूट कर मिस्मार हो जाता है क्या

आईने का आईना बेकार हो जाता है क्या

आज कल मायूस वापस आ रहे हैं क़ाफ़िले
आज कल उस दर से भी इनकार हो जाता है क्या

हाथ पाँव मारने से हो नहीं सकता अगर
डूब जाने से समुंदर पार हो जाता है क्या

आलम-ए-तन्हाई में भी उस का ऐसा ख़ौफ़ है
ज़ेहन में होता है क्या इज़हार हो जाता है क्या

हाए उस का इस क़दर मासूमियत से पूछना
लड़कियों को लड़कियों से प्यार हो जाता है क्या

— Zia Mazkoor

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Yaad Shayari

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