कैसे मुमकिन था तुझे दिल से भुलाए जाते
हक़ यही था कि तेरे नाज़ उठाए जाते
हक़ यही था कि तेरे नाज़ उठाए जाते
ज़िन्दगी रास्ता देती नहीं आसानी से
हम-सफ़र यूँ ही नहीं दोस्त बनाए जाते
तेरी ख़ातिर तो हम अपनों से भी लड़ बैठे थे
ख़्वाब दीवार से कैसे न लगाए जाते
देखते हम भी कि किस किस की तलब है दुनिया
जितने क़ैदी थे सभी सामने लाए जाते
आज़माना ही तुझे होता अगर मेरी जान
रास्ता दे के मसाइल न बताए जाते
पहले हम रूह की दीवार गिराते और फिर
राह में तेरी कई जाल बिछाए जाते
फ़ासला रखते मगर इतना कि साँस आती रहे
तेरी क़ुर्बत में कई फूल खिलाए जाते
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