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न सानी जब मज़ाक़-ए-हुस्न को अपना नज़र आया
निगाह-ए-शौक़ तक ले कर पयाम-ए-फ़ित्ना-गर आया
निगाह-ए-शौक़ तक ले कर पयाम-ए-फ़ित्ना-गर आया
कहा ला-रैब बढ़ कर इल्म-ओ-दानिश ने अक़ीदत से
जो बज़्म-ए-अहल-ए-फ़न में आज मुझ सा बे-हुनर आया
सर-ए-महफ़िल चुराना मुझ से दामन इस का ज़ामिन है
नहीं आया अगर मुझ तक ब-अंदाज़-ए-दिगर आया
बहुत ऐ दिल तिरी रूदाद-ए-ग़म ने तूल खींचा है
कभी वो बुत भी सुनने को ये क़िस्सा मुख़्तसर आया
हमारी इक ख़ता ने ख़ुल्द से दुनिया में ला फेंका
अगर दर-पेश दुनिया से भी फिर कोई सफ़र आया
मैं ख़ुद ही बे-वफ़ा हूँ बे-अदब हूँ अपना क़ातिल हूँ
हर इक इल्ज़ाम मेरे सर ब-अल्फ़ाज़-ए-दिगर आया
मुकद्दर कुछ फ़ज़ा 'गुलज़ार' दिल्ली में सही लेकिन
कहीं अहल-ए-ज़बाँ हम सा भी उर्दू में नज़र आया
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जो अभी महफ़ूज़ हैं तन्क़ीद है उन का शिआ'र
हाल उन का पूछिए जो बे-सहारे हो गए
बिन खिले मुरझा गईं कलियाँ चमन में किस क़दर
ज़र्द-रू किस दर्जा हाए माह-पारे हो गए
अम्न की ताक़त को कुचला सच को रुस्वा कर दिया
दुश्मनों के चार-दिन में वारे-न्यारे हो गए
ये ज़माना किस क़दर बार-ए-गराँ साबित हुआ
अपने बेगाने हुए बेगाने प्यारे हो गए
दुश्मन-ए-दीं दुश्मन-ए-जाँ दुश्मन-ए-अम्न-ओ-सुकूँ
एक दो का ज़िक्र क्या सारे के सारे हो गए
डूबने वालों से ज़ाइद खा रहा है उन का ग़म
जिन को साहिल तेग़-ए-उर्यां के किनारे हो गए
अश्क-ए-ग़म में नूर-ए-रहमत इस तरह शामिल रहा
चाँद-तारों से सिवा ये चाँद-तारे हो गए
हैफ़ गुलज़ार-ए-जहाँ में छा गई ग़म की घटा
जो शगूफ़े थे चमन में वो शरारे हो गए
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अब तो सहरा में रहेंगे चल के दीवानों के साथ
दहर में मुश्किल हुआ जीना जो फ़र्ज़ानों के साथ
दहर में मुश्किल हुआ जीना जो फ़र्ज़ानों के साथ
ख़त्म हो जाएँगे क़िस्से कल ये दीवानों के साथ
फिर इन्हें दोहराओगे तुम कितने उनवानों के साथ
बज़्म में हम को बुला कर आप उठ कर चल दिए
क्या सुलूक-ए-नारवा जाएज़ है मेहमानों के साथ
नफ़रतें फैला रहे हैं कैसी शैख़-ओ-बरहमन
क्या शुमार इन का करेंगे आप इंसानों के साथ
उन की आँखों की गुलाबी से जो हम मख़मूर हैं
इक तअ'ल्लुक़ है क़दीमी हम को पैमानों के साथ
हर तरफ़ कू-ए-बुताँ में हसरतों का है हुजूम
एक दिल लाए थे हम तो अपना अरमानों के साथ
कल तलक दानाओं की सोहबत में थे सब के इमाम
आज कैसे सुस्त हैं यूँ शैख़ नादानों के साथ
उन की आँखें इक तरफ़ ये जाम-ओ-मीना इक तरफ़
किस तरह गर्दिश में हैं पैमाने पैमानों के साथ
आशिक़ों के दिल में शब फ़ानूस रौशन हो गए
शम्अ''' का जीना है लाज़िम अपने परवानों के साथ
हैफ़ गुलज़ार-ए-जहाँ में गुल यगाने हो गए
लहलहा कर अब रहेगा सब्ज़ा बेगानों के साथ
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उस सितमगर की मेहरबानी से
दिल उलझता है ज़िंदगानी से
दिल उलझता है ज़िंदगानी से
ख़ाक से कितनी सूरतें उभरीं
धुल गए नक़्श कितने पानी से
हम से पूछो तो ज़ुल्म बेहतर है
इन हसीनों की मेहरबानी से
और भी क्या क़यामत आएगी
पूछना है तिरी जवानी से
दिल सुलगता है अश्क बहते हैं
आग बुझती नहीं है पानी से
हसरत-ए-उम्र-ए-जावेदाँ ले कर
जा रहे हैं सरा-ए-फ़ानी से
हाए क्या दौर-ए-ज़िंदगी गुज़रा
वाक़िए हो गए कहानी से
कितनी ख़ुश-फ़हमियों के बुत तोड़े
तू ने गुलज़ार ख़ुश-बयानी से
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