Irfan Siddiqi

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    होशियारी दिल-ए-नादान बहुत करता है
    रंज कम सहता है ए'लान बहुत करता है

    रात को जीत तो पाता नहीं लेकिन ये चराग़
    कम से कम रात का नुक़सान बहुत करता है

    आज कल अपना सफ़र तय नहीं करता कोई
    हाँ सफ़र का सर-ओ-सामान बहुत करता है

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    हट के देखेंगे उसे रौनक़-ए-महफ़िल से कभी
    सब्ज़ मौसम में तो हर पेड़ हरा लगता है

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    उठो ये मंज़र-ए-शब-ताब देखने के लिए
    कि नींद शर्त नहीं ख़्वाब देखने के लिए

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    सरहदें अच्छी कि सरहद पे न रुकना अच्छा
    सोचिए आदमी अच्छा कि परिंदा अच्छा

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    बदन के दोनों किनारों से जल रहा हूँ मैं
    कि छू रहा हूँ तुझे और पिघल रहा हूँ मैं

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    देख लेता है तो खिलते चले जाते हैं गुलाब
    मेरी मिट्टी को ख़ुश-आसार किया है उस ने

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    तू ये न देख कि सब टहनियाँ सलामत हैं
    कि ये दरख़्त था और पत्तियाँ भी रखता था

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    नहीं तो बर्फ़ सा पानी तुम्हें जला देगा
    गिलास लेते हुए उँगलियाँ न छू लेना

    Irfan Siddiqi
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    चराग़ देने लगेगा धुआँ न छू लेना
    तू मेरा जिस्म कहीं मेरी जाँ न छू लेना

    ज़मीं छुटी तो भटक जाओगे ख़लाओं में
    तुम उड़ते उड़ते कहीं आसमाँ न छू लेना

    नहीं तो बर्फ़ सा पानी तुम्हें जला देगा
    गिलास लेते हुए उँगलियाँ न छू लेना

    हमारे लहजे की शाइस्तगी के धोके में
    हमारी बातों की गहराइयाँ न छू लेना

    उड़े तो फिर न मिलेंगे रफ़ाक़तों के परिंद
    शिकायतों से भरी टहनियाँ न छू लेना

    मुरव्वतों को मोहब्बत न जानना 'इरफ़ान'
    तुम अपने सीने से नोक-ए-सिनाँ न छू लेना

    Irfan Siddiqi
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    तुम परिंदों से ज़ियादा तो नहीं हो आज़ाद
    शाम होने को है अब घर की तरफ़ लौट चलो

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