दिल को मेरे ख़ुदा अभी ताब-ए-सुख़न नहीं
लिखने चला हूँ वस्फ़-ए-रूख़-ए-यार देख कर
लिखने चला हूँ वस्फ़-ए-रूख़-ए-यार देख कर
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मतलब ही कुछ नहीं कि मुआ'फ़ी करे क़ुबूल
दिल तोड़ने से पहले तुम्हें सोचना तो था
दिल तोड़ने से पहले तुम्हें सोचना तो था
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पर्दा नशीली आँखों को जो देखते हैं हम
वो रुख़ से अपने पर्दा हटाओ ना तुम कभी
मेरी निगाह-ए-इश्क़ की हसरत है बस यही
अपनी निगाह-ए-नाज़ लूटाओ ना तुम कभी
तुम गुलसिताँ में एक कली की बहार हो
मेरे चमन में फूल को खिलाओ ना तुम कभी
गुल-हाए-रंग-रंग मिले तुम को देख कर
दिल हाए संग संग मिलाओ ना तुम कभी
एजाज़-ए-शायरी कहो अपनी ज़बान से
ख़स्ता सोहैल शे'र सुनाओ ना तुम कभी
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