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दौलते दुनिया के पीछे चल रहा है हर बशरहर बशर के पीछे लेकिन है फरिश्ता मौत का
तेरी याद में इक ग़ज़ल ऐसी गुज़रीलहू रो रहा था क़लम लिखते लिखते
माँ की करते हुए ख़िदमत मुझे आ जाए क़ज़ाऐ ख़ुदा एक ये बेटे की दुआ है तुझसे
उस ज़मीदार की दौलत पा ख़ुदा हो लानत जिससे इक भूके को खाना भी खिलाया न गया
ज़िंदगी ने बहुत सताया है मौत तू ही गले लगा ले मुझे
खोलूँ ज़बाँ मैं वक़्त के ज़ालिम के सामने क़ुव्वत मुझे भी इतनी अता कीजिये इमाम
ऐसा लगता है मुझे ईद का दिन है 'अकबर' जब भी माँ बाप के चेहरे पे खुशी होती है
लोग खाते हैं गोलियाँ "अकबर" हम को चाय सुकून देती है
मुझको करनी है नफ़्स की इस्लाह मेरी कमियाँ निकालते रहना
कोई उठता नहीं मज़लूम का हामी बनकर कब तलक ज़ुल्म पा ख़ामोश रहेगी दुनिया