Abhay Aadiv

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    जीत की एहमियत वही जाने
    जो कई बार हारा होता हैं

    फ़िक्र अंजाम की नहीं मुझ को
    रहता होकर जो होना होता हैं

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    इक कहानी की थी माँग ऐसी
    उस में बस दो ही किरदार बनते

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    देखा खुद को यूँ बेज़ार बनते
    सामने दिल के दीवार बनते

    इक नशे का ख़रीदार बनते
    इस तलब का तलबगार बनते

    हैं ख़फा करना ख़ूबी हमारी
    कैसे हम आपके यार बनते

    अब है अपनी तरफ हम किसी के
    यूँ नहीं हम तरफ़-दार बनते

    काम रिश्वत से बनता अभी भी
    क्यूँकि अफसर न हक़दार बनते

    इक कहानी की थी माँग ऐसी
    उस में बस दो ही किरदार बनते

    बे-दिली बे-क़रारी में आदिव
    बिखरे अब बाल बेकार बनते

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    मैं चाहता यही था सब चाह ख़त्म हो अब
    फिर चाहकर तुम्हें बदला ये ख़याल मेरा

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    शक है तुझे अगर ये अब भी गुदाज़ है दिल
    तो सीने से कभी ये पत्थर निकाल मेरा

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    दिल नहीं करता किसी से बात भी करने का अब
    कितनी सारी बातों को दिल से लगा बैठा हूँ मैं

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    मिले हम को भी फ़िर से इश्क़ दोबारा
    चलो अब कर के देखे इश्क़ दोबारा

    नहीं आसान के आसानी से दिल को
    हो ऐसी मुश्किलों में इश्क़ दोबारा

    रखे थी ज़िंदा हमको इश्क़ की ख़्वाहिश
    लो अब पाकर मरेंगे इश्क़ दोबारा

    बिना इस इश्क़ के कैसे गुज़ारा हो
    ज़रूरी है कि हो ये इश्क़ दोबारा

    किया है याद अंतिम बार उन को अब
    भुला के सब करेंगे इश्क़ दोबारा

    मिले थे अश्क पहले इश्क़ में आदिव
    मिलेंगे फिर से कर के इश्क़ दोबारा

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    बिना इस इश्क़ के कैसे गुज़ारा हो
    ज़रूरी है कि हो ये इश्क़ दोबारा

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    किया याद क़िस्सा पुराना हमारा
    बचा इक हैं वादा निभाना हमारा

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    फिर सोच लो इस में निवेश करते समय 'अभय'
    ये इश्क़ का बाज़ार जोखिमों के अधीन है

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